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सोमवार, 4 अगस्त 2014

सहचर रास्ते ...

पथ से बिना डिगे 
हर स्थिति
हर तकलीफ से
जूझते हुए हर रात
तारों के साथ
बतियाती हूँ/बिताती हूँ
रात कटती है
हर पल
राह बनाते 

नए ख्वाब बुनते 
हर सुबह चलती हूँ
उन राहों पर
साथ उजालों के
क्योंकि...
मंज़िल तो ठहराव है

और रास्ते 
सदा साथ होते हैं
अनवरत 

साये की तरह
सहचर बन कर
जीवनपर्यंत...


मंगलवार, 1 जुलाई 2014

लफ़्ज़ों की छांव में..!



 चित्र- गूगल से साभार 

सोचती हूँ चलते-चलते
लड़खड़ाती साँसों के सफ़र में
कुछ ऐसा लिख जाऊं जिसमें
ताज़गी हो, उम्मीदें हों
रौनक हो, खुशियां हो 
जीवन की तेज़ धूप से झुलसा
हर एक आने वाला
इन लफ़्ज़ों की छांव में
राहतों की ठंडक पाए
कब लफ्ज़ बिखर जाएं
कब ये हाथ कंपकंपाएँ
जाने कब चिता के साथ
कागज़ भी राख बन जाए
राख बन चुके कागज़ में
कुछ देर तो चमकेंगे हर्फ़
वरना क्या फर्क पड़ता है
एक मेरे होने ना होने से
वैसे भी कोई नही आया
इस नश्वर लोक में
अमरफ़ल खाकर………।

रविवार, 1 जून 2014

नियती...



नियती घट की
अंतिम बूंदों सी
विदा बेला पर
जीवन रेखा के
समाप्ति काल तक
ऐसे लगी रहेगी
दृष्टि उस द्वारे पर
जैसे कोई मोर
व्याकुल नेत्रों से
बैठ तकता है
घिर-घिर बरसते
रिक्त होते मेघ को
जैसे कोई चातक
प्यासा तरसता है
स्वाति की बूँद को
और ..........!
गुजर जाता है
एक महायुग...

शुक्रवार, 23 मई 2014

गौधूली वेला...

कोई आदि - अंत
नही होता जीवन का
हर हाल में
ज़ारी रहता है सफ़र
रुक-रुक कर शनै: शनै:
अब इच्छा है लौटने की
हो सकता है कुछ
बदलाव हो मुझमे
तो हैरान न होना
स्वीकारा है मैंने
प्रकृति का नियम
तुम भी मुझे 
ऐसे ही स्वीकारना
उस पुष्प की तरह
भले बदला हो
जिसका स्वरुप
खुशबू वही होगी
बस तुम अपनी
दृष्टी में रखना
वही विश्वास
गौधूली वेला में
जो अब तक
मेरी पहचान रहें हैं...

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

अनवरत आशा....



घंटाघर की घड़ियों को
बड़े गौर से देखते हुए
एक बुज़ुर्ग से
मैंने जानना चाहा
उनकी उत्सुकता का कारण
तो वे मुस्कुराते हुए बोले
छियासठ बरस हो गए
आशा - विश्‍वास जल से सींचते
मेरी आशा के मुरझाते बिरवे में
एक कोंपल फूटी है
हो न हो  .......
मेरे जीवन के अंत तक बदल जाए
उम्‍मीद पर तो दुनिया कायम है
और चल दिए मुस्कराहट बिखेरते
गुनगुनाते हुए वही पुरानी सी कविता
"घंटाघर में चार घड़ी 
चारों में जंजीर पड़ी
जब-जब घंटा बजता है
खड़ा मुसाफिर हँसता है"
वो सुबह कभी तो आएगी ……।

शनिवार, 8 मार्च 2014

ना जाने कब....??


रसोई - घर- आंगन
खेत - खलिहान
चकरघिन्नी सी
फिरती रहती है
दिन भर वह
जीवन सहेजने की 
कोशिश में
खुद को निहारे
वर्षों बीत गए
तरुणाई की जगह
कब झुर्रियों ने ले ली
इस तेज़ दौड में
एहसास तक नहीं
उसके थके क़दमों को 
आराम की आस नहीं
आज भी खोजती है 
अपने अस्तित्व को सिर्फ
सिन्दूर, चूड़ी, महावर में
ना जाने कब कर सकेगी
अपने व्यक्तित्व का विस्तार
दे सकेगी बंधन से परे
अस्तित्व को सही आकार ......??

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

मरीचिका...

हर पल कल की आशा
हर पल से मुग्धता
एक डोर बांधे रखती है
जीवन को साँसों से
कुछ रहस्य का मोह
ज्ञात का सम्मोह
अज्ञात को जानने का मोह
और भी गहन हो जाता है
संसार में मेरा होना
हम सबका होना
संबंध पुरातन सनातन का
रहस्य उस शक्तिमान का
जो हर बार बच जाता है
उजागर होने से
प्रतीत होता है जैसे
गुहा के भीतर गुहा है
और उसके भीतर भी गुहा
जारी रहता है पल - छिन
आना और जाना 
फिर भी रह जाता है
अनबूझा ---- अनजाना ---------

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

जीवन चदरिया...संध्या शर्मा

मन मेरा कह रहा है
एक जीवन चदरिया बुनूं
बुन सकूंगी क्या इसे??
जितना सोचा था आसान
उतना ही कठिन लग रहा है
कैसे डालूं ताना-बाना
एक - दो कि सारे धागे लूँ
बिना गांठ के धागे चुन लूँ
कितना सोचना पड़ रहा है
किसे रखूं किसे छोडूं
सारे ही इकठ्ठे कर लिए हैं
पहला धागा वात्सल्य का.... 
बड़ा ही कोमल सा है तार
यह सोच के रख लिया है
कोमलता रहेगी बरक़रार
एक तार मैत्री का बुन लिया
ताना-बाना लेने लगा आकार
लेकिन बुनाई  अब भी शेष है
आशा , सुख और आनंद के
तार भी सुनहरे मिला दिए
अब चदरिया घनी हो रही है
फिर भी कुछ कमी सी है
एक तार प्रेम का जोड़ लिया
सुन्दर बहुत है नाज़ुक सा
चदरिया को नया बाना मिला
यश, कीर्ति और अस्तित्व ने
इसे एक सुन्दर उद्देश्य दिया
सभी बड़े सुन्दर प्रसन्न
फिर भी मन था खिन्न
कुछ तार चुपचाप पड़े थे
सोचा इनमे से भी कुछ चुनुं
इन्हें भी चदरिया में बुनूं
एक तार निराशा, अपयश का
पराजय, दुख का एक -एक तार,
इन चारो को एक साथ बुनते ही
चदरिया ने पाया अपना रूप
दुःख बिना कैसा सुख है
आशा बिना निराशा कैसी
अपयश बिना यश कैसा
हार बिना जीत है कैसी
सबकी अपनी अपनी ठांव
ज्यूँ चन्दन वन का गाँव
पूरी हुई ये जीवन चदरिया
ज्यूँ जेठ की धूप संग
छाई आसाढ़ बदरिया ......

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

ये जीवन है???... संध्या शर्मा




हर रोज बैठे रहते हैं अकेले
कभी टी वी के निर्जीव चित्र देखते
कभी मोटे चश्मे से अखबार छानते
एक वक़्त था कि फुर्सत ही न थी
एक पल उसकी बातें सुनने की
आज कितनी याद आती है वह
वही सब मन ही मन दोहराते
बीच-बीच में नाती से कुछ कहते
क्या कहा कोई सुनता नहीं
अभी - अभी बहु ने गुस्से से
ऐसे पटकी चाय की प्याली
फूटी क्यों नहीं वही जानती होगी
बेटों ने ऐसे कटाक्ष किये कि
जख्मों पर नमक पड़ गया 
तन-मन में सुलगती आग
फिर भी गूंजी एक आवाज़
"बेटा शाम को घर कब आएगा"
ठण्ड से कांपता बूढ़ा शरीर
सिहर उठता है रह-रह कर
अपनी ही आँखों के आगे 
अपने शब्द और अस्तित्व
दोनों को  धूं -धूं करके

गुर्सी की आग में जलते देख
जो उड़कर बिखर रहे हैं 
वक़्त क़ी निर्मम आंधी में
कागज़ के टुकड़ों क़ी तरह...

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

जीवन एक किताब ... संध्या शर्मा


जीवन एक किताब
अधूरी सी ..........
आने वाला हर दिन
एक कोरा पन्ना
हर दिन लिखती हूँ
भावों की इबारतें
कभी भरती हूँ
आशाओं की सरिता
प्रवाहों के बीच पड़े
बड़े-बड़े पत्थर
उनपर जमी
वक़्त की काई
साथ चलते दो किनारे
पेड़ों की घनी कतारें
डालियों पर गूंजता
पंछियों का कलरव 
सतरंगी किरणों को
पंखों में समेटे
फूल - फूल पर
मंडराती तितलियाँ 
भंवरों  का गुंजन
प्यारा सा गाँव
गुलमोहर की छाँव
रहट-रहट सी सांस
तिनका-तिनका आस
बैलों की रुनझुन
छप्पर-खलिहान
फूली सरसों
गमकते टेसू
बहती पुरवाई
उड़ती चूल्हे की राख
रंभाती गाय
मस्ती से उछलते बछड़े
बहती नदिया की
कल-कल धार
करती जीवन साकार
तो किसी पन्ने पर
पल्लू के कोने में बंधी
माँ की हिदायतें
कमरे से झाड़ी धूल
रसोई में पकते
खाने की खुशबू
चौकी-बेलन संग
खनकती चूड़ियों का
मिला-जुला राग https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgUxzKsTj2UTMvnC8X3ElPqAnA5c0ccj4HKbDIOGLjUPaWdwKTr6kqu8xmrsAwrg7sZrqp07_IvTunpM8cGkc_K6-ygVsTPQI3tYxv-QNIXlWSymAX-b1jBBesSh305ibBSVqNOx9NdQd0/s400/book+of+life.jpg
और भी न जाने
कितना कुछ है
अस्त-व्यस्त सा
समय कहाँ मेरे पास
सजाऊं-संवारूं इसे
मैं तो एक सैलानी हूँ  
अतीत-वर्तमान को
रोज समेटती हूँ
इन पन्नो पर 
समीक्षा के लिए
दे जाऊंगी समय को
उस दिन जब यह मेरी
जिल्द से लिपटी किताब होगी
तब यह सिर्फ मेरे नहीं
हर पढने वाले के हाथ होगी ........

बुधवार, 7 नवंबर 2012

मेरे कालिदास...संध्या शर्मा

हर बार..........
जब भी कुछ लिखने बैठती हूँ
बहुत कोशिश करती हूँ
तुमको ना लिखूं
फिर भी आ ही जाते हो
तुम कहीं ना कहीं से
तुम्हारे आते ही
छाने लगते है
भावों के मेघ
बरसने लगती हैं,
सुन्दर शीतल
शब्दों की बूँदें
धीरे से इनमे समाकर
दे जाते हो मेरे सूखे शब्दों को
हरियाला सावन 
मेरे जीवन के  मेघदूत
मेरे कालिदास...

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

तुम जो मिल गए हो... संध्या शर्मा

मेरे जीवन का 
हर रंग, हर अहसास
हर महक, हर स्वाद
सिर्फ तुमसे है
कोई वजूद नहीं मेरा
तुम्हारे बिना
मेरी आँखों में
चमकता है
तुम्हारा प्यार
महकती है
तुम्हारी खुशबू से
मन की रजनीगंधा 
रौशन है
तुम्हारी चांदनी से
मेरी हर शाम
तुम्हारा साथ
आशा की रेशमी डोर
तुम्हारा हाथ
मज़बूत विश्वास
हर आहट मुझ तक
तुमसे होकर आती है
इतना ही  जानता है
मेरा कोमल मन
तुमसे मिला अपनापन
न्योछावर है तुमपर
मेरा सर्वस्व
समर्पित है तुम्हे
सारा जीवन..... 

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

मुखौटों की बस्ती.... संध्या शर्मा

http://www.janokti.com/wp-content/uploads/MasksChungSungJunGetty.jpgइतनी बडी बस्ती में
मुझे एक भी इंसान नहीं दिखता
चेहरे ही चेहरे हैं बस
किस चेहरे को सच्चा समझूँ
किसे झूठा मानूं
और उस पर इन सबने
अपनी जमीन पर बाँध रखी है
धर्म की ऊंची - ऊंची इमारतें
इन्ही में रहते हैं ये मुखौटे

क्षण प्रतिक्षण बदल लेते हैं
नाम, जाति, रंग‍,रूप

बसा रखा है सबने मिलकर
मुखौटों का एक नया शहर
जिन्हें चाहिए यहाँ सिर्फ मुखौटे
जिनमे मन, ह्रदय,
भावना कुछ नहीं
बस फायदे नुकसान के सबंध
इंसान जिए या मरे
कोई फर्क नहीं पड़ता 

इन मुखौटों को
लगे हैं
कारोबार में
श्मशान विस्तारीकरण के
ये नहीं जानते
मृत्यु केवल अंत नहीं
आरंभ भी है
भय नहीं आनंद भी है
जीवन एक परवशता,
अनिश्चितता है
सिर्फ और सिर्फ
मौत की निश्चितता है

साफ-साफ नज़र आने लगे हैं 
इन मुखोटों के पीछे छिपे चेहरे
बदलेंगे मुखौटे लेकिन 
नहीं बदलेंगे उनके चेहरे
इस सच्चाई के साथ
मैंने भी जीना सीख लिया है
मुखौटो की बस्ती में
अपना घर बना लिया है!!!!!

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

जीवन संध्या....संध्या शर्मा

सुबह से शाम
चलते-चलते
थक गया तन
सुनते-सुनते
ऊबा मन
आँखें नम
निर्जन आस
भग्न अंतर
उद्वेलित श्वास
बहुत उदास
कुछ निराश
शब्द-शब्द
रूठ रहे हैं
मन प्राण
छूट रहे हैं
पराया था
अपना है
कभी लगता
सपना है
सूरज जैसे
अस्त हो चला
अंतिम छंद
गढ़ चला.................!

सोमवार, 10 सितंबर 2012

कोई आया भी तो......संध्या शर्मा

जब बीत गया सावन  
घिरकर क्या करेंगे घन
सूखे मन के उपवन में
कोई आया भी तो क्या आया

ख़ुशी बसंती बयार हो
कोयल गीत गाती हो
बसंती राग पतझर ने
कोई गाया भी तो क्या गाया

लगी हो आग सावन में
तन-मन झुलसा हो
जल रहा गीत जब हो
कोई मल्हार गाया तो क्या गाया
                                                                                     
खुली रखीं प्रतीक्षा में
जाने कब से ये आँखें
थककर मूँद ली पलकें
कोई आया भी तो क्या आया

तड़पकर बूँद को जिसकी
प्यासा मर गया चातक
सजल घन मौत पर उसकी
कोई रोया भी तो क्या रोया

जीवन भर उजाले को
भटकती रही व्याकुल
जलाकर दीप समाधि पर
कोई लाया भी तो क्या लाया

सोमवार, 27 अगस्त 2012

कोरे पन्ने जीवन के... संध्या शर्मा

बहुत कुछ लिखना है
जीवन की किताब में
कुछ शब्द उकेरना है
कुछ भाव समेटना है
कहाँ से शुरुआत करूँ
कहाँ जाकर रुकूँ
कभी लगता है भूत लिखूं
भविष्य लिखूं
क्यों ना वर्तमान लिखूं
यहाँ भी भटक जाती हूँ
लिखने लगती हूँ
बिना स्याही के
शब्द उभरते नहीं
स्याही मिली
तो शब्द ना सूझे
मिले भी तो ऐसे
कि भर आये नयनो से
झर-झर  झर गए
जीवन के पन्ने
कोरे थे
कोरे ही रह गए....

शनिवार, 21 जुलाई 2012

मुक्ति...?---- संध्या शर्मा


जन्म से आज तक 
हर नाता हर रिश्ता
मांगता रहा मुझसे
बीत गया जीवन
पूरी करते अपेक्षा
ख़ुशी से देह छोड़
बनना पड़ा शिला
धूप हवा बारिश
सब झेलकर भी
अपेक्षा के भार से
मुक्त रहा युगों तक
अचानक एक दिन
खंडित किया मुझे
ले आये उठाकर
रहा अब भी पत्थर
लेकिन मंदिर का
तब से कतार है
मेरे समक्ष लम्बी
दिन - रात मांगते
लोग कुछ न कुछ
फिर दबाने लगे
अपेक्षाओं तले
अपेक्षाओं तले दबकर
फूट जाऊँगा एक दिन
उड़ जाऊंगा माटी बन
दसों दिशाओं में
समाप्त हो जायेगा
मेरा अस्तित्व
उड़ेगा धूल बन
हवा के संग - संग
क्या वही होगी 
सच्ची मुक्ति...?

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

दायरे...संध्या शर्मा

जन्म से पूर्व 
माँ के गर्भ से
आदत बन गया
दायरे के भीतर जीना
जीते रहे इसी दायरे में
साथ-साथ  जीते-जीते
हिस्सा बन गया जीवन का 
जन्म के बाद भी
मुक्त ना हो सके
कई बार सोचा
मुक्त हो जाऊं
खुलकर सांस लूँ
स्वयं की मालिक खुद बनूँ
क्यों न तोड़ दूँ इसे
इससे बाहर निकलूं
जीकर देखूं कुछ पल
लेकिन ऐसा हो ना सका
भला एक इन्सान की
इन पक्षियों के साथ 
कैसी बराबरी
स्वीकार है मुझे यह संग
जीवन के तमाम रंग
  यहाँ कभी कुछ मिलता है
कुछ नहीं भी मिलता है 
बस दुःख इस बात का है
धरती का प्रेम मिला 
पर खुला आसमान नहीं ...

शनिवार, 19 मई 2012

आकांक्षा... संध्या शर्मा


खूब सो लिए जाग जाओ न, 
तुम आलस दूर भगाओ न.

कल कर लेना कल की बातें,
तुम गीत सुहाने दुहराओ न.

गहरे सागर से चुन-चुन कर,
चमकीले मोती ले आओ न .

जीवन की उर्वर धरती पर,
कुछ अपना सा बो जाओ न .

इन्द्रधनुष सा बनकर चमको,
तुम बादल जैसे छा जाओ न .

सांझ बीत गई रात आ गई,
अब चाँद को घर ले आओ न .

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

"अंजोरिया".... संध्या शर्मा


अंधियारे में ज्योत जगाता 
आया दीप जलाने वाला
 मुरझाये जीवन में हमने 
पाया फूल खिलाने वाला

विरहा के पल-पल से उपजा
मधुर मिलन का बीज निराला 
 क्षितिज ओर से नीलगगन पर
फैला बनकर नया उजाला

अधरों से सुधा रस बरसा
नैनो से झलके मधुशाला
 झूम उठी हर डाली-डाली
पागल हुआ मन मतवाला

गीत ग़ज़ल में झलक उसकी
वह अक्षर की मोती माला
उर की हर धड़कन में गूंजे
राग सरगमिया यादों वाला

भाग्य लिखित जो भी होगा
पाएगा दुनिया में पाने वाला
बस एक नाम ही रह जाएगा
दुनिया का है खेल निराला