शनिवार, 12 अप्रैल 2014

अनवरत आशा....



घंटाघर की घड़ियों को
बड़े गौर से देखते हुए
एक बुज़ुर्ग से
मैंने जानना चाहा
उनकी उत्सुकता का कारण
तो वे मुस्कुराते हुए बोले
छियासठ बरस हो गए
आशा - विश्‍वास जल से सींचते
मेरी आशा के मुरझाते बिरवे में
एक कोंपल फूटी है
हो न हो  .......
मेरे जीवन के अंत तक बदल जाए
उम्‍मीद पर तो दुनिया कायम है
और चल दिए मुस्कराहट बिखेरते
गुनगुनाते हुए वही पुरानी सी कविता
"घंटाघर में चार घड़ी 
चारों में जंजीर पड़ी
जब-जब घंटा बजता है
खड़ा मुसाफिर हँसता है"
वो सुबह कभी तो आएगी ……।

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर .... कितनी और कैसी आशाएं ...?

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  2. आपकी लिखी रचना रविवार 13 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. बहुत सुन्दर ... आशा है तो जीवन है ..

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  4. विषम परिस्थितियों में मनुष्य को आधार से डिगना नही चाहिए। यही आशा उसे जीवन पथ पर निरंतर अग्रसर करती है। संदेशपूर्ण कविता के लिए आभार।

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  5. सुबह की उम्मीद रात के अंधेरों को झेल जाती है .
    आशावादी रचना !

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  6. बहुत ही खूब ... आशा और उम्मीद ही तो जीवन अहि ... फिर सुबह जरूर आती है ...

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  7. सुन्दर बिम्ब के साथ शानदार रचना

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  8. वो सुबह कभी तो आएगी …आशावादी रचना .

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  9. "घंटाघर में चार घड़ी
    चारों में जंजीर पड़ी
    जब-जब घंटा बजता है
    खड़ा मुसाफिर हँसता है"
    वो सुबह कभी तो आएगी ……।

    बहुत ही सुन्दर.

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