सोमवार, 9 मार्च 2020

होली है भई होली है ....



रंग-अबीर-गुलाल उड़ाती 
ढोल-नगाड़े-चंग बजाती
फिरती मस्तों की टोली है 
होली है भई होली है

कहीं फाग, कहीं पर रसिया 
सबकी प्यारी बोली है 
भंग-रंग के मद में गाते 
कानों में मिश्री घोली है 

फिरती मस्तों की टोली है 
होली है भई होली है 

टेसू दहके, महुआ गमके 
फूलों भरी रंगोली है 
बाजे शहनाई ढोल मंजीरे 
कोयल की तान अलबेली है 

फिरती मस्तों की टोली है 
होली है भई होली है 

सद्भाव बढ़े, कटुता मिटे 
हर रंग प्रेम की रोली है 
भेदभाव और द्वेष मिटाती 
खुशियों भरी ठिठौली है 

फिरती मस्तों की टोली है 
होली है भई होली है 

झूम झूमकर नाच गा रहे 
मिलजुल सब हमजोली है 
लाल गुलाबी नीले पीले
रंगो से भर गई झोली है

रंग-अबीर-गुलाल उड़ाती 
ढोल-नगाड़े-चंग बजाती
फिरती मस्तों की टोली है 
होली है भई होली है..... 

फ़ीके न पड़ें कभी ज़िन्दगी के रंग 
आप अभी को रंगो के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनायें व बधाई ... 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

अधूरे सपनों की कसक......


‘सपने’ सिर्फ़ कहानी नही, यह तो एक... सफ़र है – ज़िंदगी का सफ़र। जहाँ आँखें सपने देखती हैं, उनमे से कुछ पूरे होते हैं तो कुछ अधूरे रह जाते हैं।

जैसे सपनों के पूरे होने पर ज़िन्दगी चलती रहती है, वैसे ही उनके टूटने पर थमती नहीं। वक़्त  और परिस्थितियां इस अधूरेपन के साथ जीना सिखा देती हैं, लेकिन ज़िंदगी चलती रहती है....

कहते हैं जब हम सपना ही नहीं देखेंगे तो उन्हें पूरा कैसे करेंगे। हम जब तक जीवित हैं सपने देखते रहते हैं। उम्र के हर पड़ाव और परिस्थियों के साथ बदलते सपने।

ब्लॉगरों के ऐसे ही अधूरे सपनों की कसक को रेखा श्रीवातव दी ने संजोकर एक पुस्तक का रूप दिया है, जो अत्यंत ही श्रमसाध्य कार्य था। 

एक मार्च को इस पुस्तक का विमोचन किया जाना है, तो दिल्ली में जमावड़ा होगा देश के जाने - माने हिंदी ब्लॉगरों का। विमोचन के बहाने ब्लॉगर मिलन इस कार्यक्रम  की शोभा में चार चाँद लगा देगा। 

हिंदी ब्लॉगिंग की बगिया पुनः हरी भरी हो, इसे नई दिशा और दशा प्राप्त हो। इसी आशा और विश्वास के साथ कार्यक्रम की सफलता हेतु रेखा दी व पुस्तक के सभी लेखकों व पूरी सम्पादकीय टीम को हार्दिक बधाई व शुभकामनायें ...

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2019

जल्दी आना ओ चाँद गगन के .....



करवा चौथ

मैं यह व्रत करती हूँ
अपनी ख़ुशी से
बिना किसी पूर्वाग्रह के
करती हूँ अपनी इच्छा से
अन्न जल त्याग
क्योंकि मेरे लिए
यह रिश्ता ....
इनसे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है
मेरे लिए यह उत्सव जीवन में
उस अहसास की ख़ुशी व्यक्त करता है
कि उस ख़ास व्यक्ति के लिए
मैं भी उतनी ही ख़ास हूँ
मैं उल्लसित होकर सजती संवरती हूँ
मेरे लिए मेहँदी , सिन्दूर ,चूड़ियाँ, महावर
संस्कारों और संस्कृति का हिस्सा हैं
सबसे अनमोल गहने हैं  
दीप अक्षत रोली हल्दी कुंकुम की थाल सजाकर
भागदौड़ के जीवन से कुछ पल चुराकर
चाँद - तारों और खुले आसमान के साथ
प्रकृति के बहुत क़रीब होती हूँ
चाँद की प्रतीक्षा करती हूँ
भावविभोर होकर महसूस करती हूँ  
चाँद का धरती के प्रति तन्मयता से
निभाया जाने वाला
सदियों का प्यार और समर्पण
और धन्य हो जाती हूँ
उस चाँद की उपमा पाकर  ...... 

शनिवार, 31 अगस्त 2019

मेरी नज़्म... संध्या शर्मा

 ख़यालों के पंख लगाकर
ख़्वाबों की उड़ान भरकर
कितनी भी दूर क्यों न चली जाए
लेकिन लौट आती है "मेरी नज़्म"
उतर आती है ज़मी पर
मेरे साथ नंगे पाँव घूमती है
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल, बूटा -बूटा
इसलिए तो तरोताज़ा रहती है
जब कभी यादों के सात समंदर पार करके
थककर निढाल हो जाती है
तो बैठ जाती हैं मेरे साथ
साहिल की ठंडी रेत पर
जाने क्या लिखती - मिटाती
बड़ी शिद्द्त और ख़ामोशी से
देखती रहती है.....
ख्वाहिशों की तरह
लहरों का आना
और पत्थरों से चोट खाकर
बार-बार लौट जाना...