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बुधवार, 5 जून 2024

हरियाली खुशहाली है... संध्या शर्मा

बच्चों आओ मैं हूँ पेड़

मुझे लगाओ करो ना देर

जब तुम मुझे उगाओगे 

धरती सुखी बनाओगे

दुनिया मेरी निराली है

हरियाली खुशहाली है


रोको मुझपर होते प्रहार

मैं हूँ जीवन का आधार

छाँव फूल फल देता हूँ

तुमसे कुछ नही लेता हूँ

वायू जहरीली पीता हूँ

शुद्ध हवा तुम्हें देता हूँ


प्रकृति का सम्मान करो

वसुंधरा का तुम ध्यान धरो

मेरा मन भी बहुत रोता है

दुख मुझको भी होता है

अब तो मुझको ना काटो

टुकड़ों टुकड़ों में ना बांटो 


मुझसे ही बनते हैं उपवन

मैं हूँ, तो जीवित हैं ये वन

देता हूँ पंछी को ठिकाना

और चिड़ियों को दाना

रूठी प्रकृति को मनाना

कहते थे ये दादा नाना

बात उनकी तुम मानोगे

घर - घर पेड़ लगाओगे

शनिवार, 4 जून 2022

क़वायद .... ! - संध्या शर्मा

 

जब बारिश आती है 

शुरू हो जाती है

क़वायद  .... !

एक तरफ धरती की

दूसरी ओर इंसान की

धरा ढूंढती है कॉन्क्रीट के बीच

जल को आत्मसात करने की जगहें

और इंसान तलाशता है

पानी से बचने का ठौर

__संध्या शर्मा__

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

मेरा चाँद ...

मेरा चांद समझता है
मेरे चूड़ी, बिछुए, झुमके
पायल की रुनझुन बोली
सुन लेता है, वह सब
जो मुझे कहना तो था
लेकिन किसीसे ना बोली
पढ़ लेता है मेरी
आँखों की भाषा
हरपल बिखेरता रहता है
स्नेह की स्निग्ध चाँदनी
अमृत बरसाता है
अहसास दिलाता है
जीवन की धुरी हूँ मैं
अधूरा है वह मेरे बिना
कभी आधा नही होता
मेरा चाँद .....
मेरी खुशी में पूनम सा
जरा सी नाराजगी से
अमावस भले हो
वह चमकता चांद है
मेरी दुनिया के आसमान का
मैं शीतल किरणों में लिपटी
उसकी रौशनी से रौशन
धरती की तरह ..
 ('करवा चौथ' के मंगल पावनपर्व पर हार्दिक शुभकामनायें ....)

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बरखा की रुत तुम भूल न जाना...

बरखा की रुत तुम भूल न जाना, सजना अब आ जाना,
आज बदरिया झूम के बरसी, संग सावन पींग झुलाना।।

बूंद बूंद से घट भर जाए
ताल तलैया भी हरसाए
जाग के नींद से कलियाँ
भँवरों को समीप बुलाएँ
बरखा रानी झम्मके बरसो, वन-उपवन का मन हरसाना,
उमड़ घुमड़ के ऐसे बरसो, धरती की तुम प्यास बुझाना।।

काले मेघों की रुत आई
काली - काली घटा छाई
सावन की फुहारों ने भी
झूम - झूम प्रभाती गाई
बोलन लागे मोर बगिया में, चकवा संग गाए राग पुराना,
रात अमावस की है काली, गरज तरज बिजली चमकाना।।

सांझ ढले मैं दीया बालूँ
देहरी पर मैं चौक पुराऊं
राह तकूं कब तक बैरी
दूर दूर लों मैं देखूं भालूं
डगर चलत बटोही आवेगा, चमकेगा कब चेहरा नुराना,
देखत बाट भई बावरिया, सावन में सांवरिया आ जाना।।

गुरुवार, 19 जून 2014

पहली फुहार...


आई बरखा
गूँजने लगा
बूंदों का संगीत
भीगने लगा
अलसाया मौसम
पहली फुहार के
स्वागत को आतुर
पंख पसारे
मन मयूर
धुल गई
पत्ती-पत्ती
खिल गई
डाली-डाली
कोरी धरती पर
लिखने वाली है
फिर से हरियाली .....

बुधवार, 31 जुलाई 2013

सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ...संध्या शर्मा

सखी री! गुनगुनाऊँ, 
गीत एक गाऊँ
अपनो के मेले मे,
कभी अकेले में,
एक पल मुस्कुराऊँ,
गीत एक गाऊँ
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ

बरखा की रिमझिम में,
फ़ुहारों की टिम टिम में,
पंख फ़ैलाए उड़ जाऊँ
झिंगुरों की छुनछुन में,
घुंघरुओं की रुनझुन में,
बांसुरी बन बन जाऊँ
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ

पायल की रुनझुन में
झरनों की कल कल में,
हरियाली चूनर सजाऊँ
चिड़ियों की चुन चुन में,
भौंरों की गुन गुन में,
भीगी भीगी सी लहराऊँ
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ

लता पात की मुस्कानों में,
दामिनी के आसमानों में,
सुनहरे गोटे जड़ाऊँ,
प्रात की मधुर वेला में,
अनुपम किरणों की छटा में,
स्वागत थाल सजाऊँ .
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ

सपनों के अपने गाँव में,
बरगद पीपल की छांव में,
पींगे खूब झुलाऊँ,
चम्पा की सुगंध में,
गुड़हल के मकरंद में,
बन के सुवास समा जाऊँ,
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ

धरती की धानी चुनरी पे, 
गगन की सुंदर कुरती पे,
चाँद सितारे जड़ाऊँ,
क्षितिज के छोरों में,
सरस सलिला के धोरों में,
एक नया जीवन पाऊँ .
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ

सावन की गोरी सी,
पनघट की अल्हड़ छोरी सी,
मैं मंद मंद मुस्काऊँ
आएगें सजना जब,
बोलेगें पायल कंगना तब,
मैं बिंदिया अब सजाऊँ
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

मैं धरती सी ……………… संध्या शर्मा


जुगनु सा है जीवन मेरा
क्षण में बुझती जलती हूँ
मन भर प्रकाश फ़ैलाने
नित जोत सी जलती हूँ

                                               सूरज ढलता पश्चिम में
                                              मै चौबारे पर ढलती हूँ

हूं माटी का एक घरोंदा
नश्वर जग की राही हूँ
नही रही चाह महल की
सिर्फ़ तेरी चाहत चाही हूँ
सूरज ढलता पश्चिम में
मै चौबारे पर ढलती हूँ

                                                जुगनु सा है जीवन मेरा
                                                क्षण में बुझती जलती हूँ

तन्हाई में बैठ अकेले
बीज प्यार के बोती हूँ
कैसे गाऊँ गीत सुहाने
सूली सेज पे सोती हूँ
नियति यही रही मेरी
धरती जैसे चलती हूँ

                                             मन भर प्रकाश फ़ैलाने
                                              नित जोत सी जलती हूँ

हरा भरा प्रीत का झरना
बहे सुवास अमराई में
कांटे चुन लूं राह के तेरी
संग हूँ जग की लड़ाई में
दिवस ढलता चंदा ढलता
मै यामिनी सी जगती हूँ

                                           नियति यही रही मेरी
                                         धरती जैसे चलती हूँ

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

मुझे डर है... संध्या शर्मा

दरअसल मैं रेगिस्तान में ही पैदा हुई हूँ 
और तुम
ले जा रहे हो मुझे सागर में
मुझे प्यास नहीं कोई चाह नहीं
हाँ डर है...!
कहीं सागर निगल न ले
मेरे अस्तित्व को

ध्यान से देखो मुझे मैं तो पत्थर हूँ
और तुम
ले जा रहे हो मुझे हिमशिखर पर
पारस बनने की चाह नहीं
हाँ डर है 
कहीं पिघल ना जाऊं 
मोम बनकर...!

मैं तो एक बूँद हूँ, नन्ही सी ओस की
और तुम
बनाना चाहते हो बदली
नहीं घिरना चाहती झूमकर
हाँ डर है
कहीं बरस ना जाऊं
और समा जाऊं धरती में हमेशा के लिए...! 
 


 
 
 

सोमवार, 1 अगस्त 2011

बारिश.... संध्या शर्मा

तपती दोपहर की,
ठहरी हुई तपिश में,
एक टुकड़ा बादल का,
तुम्हारे नयनो में
घुमड़ने लगा है,
बरस रहा है,
मेघ तुम्हारे नेह का,
ठंडी अमृत बूँद सा,
टूट-टूट कर
मेरे मन की कच्ची धरा पर,
मुझे भिगो रहा है ,
और शर्मा कर छुपा लिया है,
मैंने अपने आप को,
धानी
सी चूनर में,
धरती की तरह....
 

बुधवार, 27 जुलाई 2011

चाँद ... संध्या शर्मा


ताकती हूँ उसे बड़ी आस से,
छूना चाहती हूँ पास से,
सोचती हूँ उसे देखकर,
जब मैं पुकारूँ तो,
आयेगा वह इस धरती पर,
अगर नहीं आ सका,
तो बुला लेगा मुझे वहां,
तभी ख़याल आता है,
ये धरती भी तो कभी,
ऐसी ही रही होगी,
स्वच्छ, निर्मल, प्रदुषणमुक्त
क्या कसूर था उसका,
क्यूँ ये हाल हुआ उसका,
पर दोष है किसका...?
डर जाती हूँ सोचकर,
और...
नहीं बुलाना चाहती उसे यहाँ,
ना जाना चाहती हूँ वहां,
ओ मेरे प्यारे से चाँद,
तुम जहाँ हो वहीँ रहो,
मेरी दुआ है,
पीड़ा इस धरती सी  
कभी ना सहो....