शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बरखा की रुत तुम भूल न जाना...

बरखा की रुत तुम भूल न जाना, सजना अब आ जाना,
आज बदरिया झूम के बरसी, संग सावन पींग झुलाना।।

बूंद बूंद से घट भर जाए
ताल तलैया भी हरसाए
जाग के नींद से कलियाँ
भँवरों को समीप बुलाएँ
बरखा रानी झम्मके बरसो, वन-उपवन का मन हरसाना,
उमड़ घुमड़ के ऐसे बरसो, धरती की तुम प्यास बुझाना।।

काले मेघों की रुत आई
काली - काली घटा छाई
सावन की फुहारों ने भी
झूम - झूम प्रभाती गाई
बोलन लागे मोर बगिया में, चकवा संग गाए राग पुराना,
रात अमावस की है काली, गरज तरज बिजली चमकाना।।

सांझ ढले मैं दीया बालूँ
देहरी पर मैं चौक पुराऊं
राह तकूं कब तक बैरी
दूर दूर लों मैं देखूं भालूं
डगर चलत बटोही आवेगा, चमकेगा कब चेहरा नुराना,
देखत बाट भई बावरिया, सावन में सांवरिया आ जाना।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. काले मेघों की रुत आई
    काली - काली घटा छाई
    सावन की फुहारों ने भी
    झूम - झूम प्रभाती गाई
    ... और ये प्रभ्‍ााती मन को हर्षा जाती है
    अनुपम भाव

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-07-2014) को "संस्कृत का विरोध संस्कृत के देश में" (चर्चा मंच-1679) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. वाह .... बहुत सुन्दर चित्रण किया है

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  4. आयेंगे ज़रूर आयेंगे :-)
    बहुत प्यारा गीत...

    सस्नेह
    अनु

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  5. पावस ॠतु में उपजे विरही नायिका के मनोभावों सुंदर चित्रण

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. मन के भावों को लिख दिया ....बहुत खूब

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  8. प्रीत भरी मनुहार और अंतर की पुकार..

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  9. बहुत ही मनमोहक गीत ... बरखा, मौसम की फुहार ... कान्हा का प्रेम ... सभी कुछ एकसाथ लिए .. मधुर प्रीत को समर्पित भाव ..

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  10. मनभावन आया है सावन तो कैसे भूलेगा साजन ?

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  11. बरखा रानी झम्मके बरसो, वन-उपवन का मन हरसाना,
    उमड़ घुमड़ के ऐसे बरसो, धरती की तुम प्यास बुझाना।।
    सावन आये और मन मे सुन्दर प्यारे प्यारे भाव न उठें ये कैसे हो सकता है< मनभावनी कविता

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