सोमवार, 1 अगस्त 2011

बारिश.... संध्या शर्मा

तपती दोपहर की,
ठहरी हुई तपिश में,
एक टुकड़ा बादल का,
तुम्हारे नयनो में
घुमड़ने लगा है,
बरस रहा है,
मेघ तुम्हारे नेह का,
ठंडी अमृत बूँद सा,
टूट-टूट कर
मेरे मन की कच्ची धरा पर,
मुझे भिगो रहा है ,
और शर्मा कर छुपा लिया है,
मैंने अपने आप को,
धानी
सी चूनर में,
धरती की तरह....
 

31 टिप्‍पणियां:

  1. सावन की बूंदे ,भीषण गर्मी में तपती धरती को प्रेम से अभिसिंचित करती है .......बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  2. बरस रहा है,
    मेघ तुम्हारे नेह का,
    ठंडी अमृत बूँद सा,
    बिल्‍कुल सच कहा है आपने प्रत्‍येक पंक्ति में ... बेहतरीन प्रस्‍तुति....संध्या जी

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  3. सावन की रिमझीम फुहारों सी सुंदर रचना।

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  4. मैंने अपने आप को,
    धानी सी चूनर में,
    धरती की तरह....
    वाह बहुत ही भीनी भीनी रचना।

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  5. रिम झिम रिम झिम और बारिश की फुहार की तरह आपकी ये रचना... भावनाओं से ओत प्रोत ये कविता मन मोहती है....

    आकर्षण

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  6. सावन के मौसम में सुन्दर कविता....वाह...

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  7. @मेघ तुम्हारे नेह का..

    उम्दा बिंब है। सुंदर कविता के लिए आभार

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  8. तपती दोपहर की,
    ठहरी हुई तपिश में,
    एक टुकड़ा बादल का,
    तुम्हारे नयनो में घुमड़ने लगा है,

    bahut hi pyari rachna....

    jai hind jai bharat

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  9. सावन के मौसम और ये सुन्दर कविता...धन्यवाद

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  10. वाह। बेहतर भाव से सजी सुंदर कविता।

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  11. बेहतरीन।
    ---------
    कल 03/08/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  12. वाह, बहुत खूब...सुन्दर दृश्य उभर रहे हैं...

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  13. बरस रहा है,
    मेघ तुम्हारे नेह का,
    ठंडी अमृत बूंद-सा,
    टूट-टूट कर
    मेरे मन की कच्ची धरा पर,
    मुझे भिगो रहा है ,


    आहाऽऽह्… ! बरसात की सुहावनी फुहारों-सी मनभावन रचना के लिए हार्दिक आभार स्वीकार करें ।

    आप बहुत श्रेष्ठ कविताएं लिखती हैं … आभार !


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  14. सुंदर ....बहुत सुंदर भाव लिए रचना

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  15. बहुत ही खुबसूरत लग रहा है सबकुछ ......

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  16. बरस रहा है,
    मेघ तुम्हारे नेह का,
    ठंडी अमृत बूँद सा,

    बहुत खूबसूरत भाव मयी रचना

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  17. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  18. सुंदर रचना।
    गहरे भाव।
    शुभकामनाएं आपको........

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  19. सुन्दर रचना
    सादर
    तृप्ति

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  20. बहुत ही सुन्दर और प्यारी कविता .. पढकर बहुत ही अच्छा लगा .. आपको बधाई
    वैसे मैं भी नागपुर से ही हूँ ... लक्ष्मीनगर में रहता था ..अब हैदराबाद में हूँ ..
    आभार

    विजय

    कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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  21. मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
    आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
    पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

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  22. वाह !!!
    सावन सी मनभावन रचना...
    संयोग की जादुई अभिव्यक्ति

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  23. बहुत मीठी सी ... सौंधी मिट्टी की सुगंध लिए ... प्यारी सी राक्स्हना है ...

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  24. मुझे भिगो रहा है ,
    और शर्मा कर छुपा लिया है,
    मैंने अपने आप को,
    धानी सी चूनर में,
    धरती की तरह....

    वाह बहुत सुंदर।

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