बुधवार, 27 जुलाई 2011

चाँद ... संध्या शर्मा


ताकती हूँ उसे बड़ी आस से,
छूना चाहती हूँ पास से,
सोचती हूँ उसे देखकर,
जब मैं पुकारूँ तो,
आयेगा वह इस धरती पर,
अगर नहीं आ सका,
तो बुला लेगा मुझे वहां,
तभी ख़याल आता है,
ये धरती भी तो कभी,
ऐसी ही रही होगी,
स्वच्छ, निर्मल, प्रदुषणमुक्त
क्या कसूर था उसका,
क्यूँ ये हाल हुआ उसका,
पर दोष है किसका...?
डर जाती हूँ सोचकर,
और...
नहीं बुलाना चाहती उसे यहाँ,
ना जाना चाहती हूँ वहां,
ओ मेरे प्यारे से चाँद,
तुम जहाँ हो वहीँ रहो,
मेरी दुआ है,
पीड़ा इस धरती सी  
कभी ना सहो....
 

34 टिप्‍पणियां:

  1. अलग अंदाज में पर्यावरण के प्रति सजगता का सन्देश देती - सुंदर रचना

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  2. कविता और उसके भाव बहुत ही सराहनीय हैं। लेकिन इस कविता के साथ लगी तस्वीर आंखो के सामने से हटती ही नहीं है। बहुत सुंदर तस्वीर है।
    शुभकामनाएं..

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  3. निश्चित तौर पर धरती की पीड़ा सभी को समझने की ज़रूरत है।
    पर्यावरण संरक्षण का सार्थक संदेश देती हुई कविता।


    सादर

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. भावनाओं से भरपूर.....


    आदर सहित

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  6. कमाल की कल्पना और संवेदना हैं आपकी.
    चाँद भी लाचार सा हो आपकी बातों पर गौर
    कर रहा होगा.
    सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आभार.

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  7. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...सुन्दर

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  8. धरती का सिर्फ इतना ही कष्ट नहीं है संध्या जी... धरती तो करोड़ों लोगों के लातों के प्रहार भी सहती है.... कल्पना किजीए कि अगर चांद को भी ये प्रहार सहना पड़े तो....
    वैसे मेरे ब्लॉग पे मेरी एक कविता है... उसका लिंक मैं यहां दे रहा हूं... अगर पसंद आए तो टिप्पणी जरुर करें

    http://aakarshangiri.blogspot.com/2010/10/blog-post.html

    आकर्षण

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  9. काश। हम सभी ये समझ पाते।

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  10. Apki is rachna par hum kya tippani karen,
    ek ped tum lagao ek ped hum lagaye or hariyali bharpur karen....

    Bahut hi achi rachna........

    Jai hind jai bharatApki is rachna par hum kya tippani karen,
    ek ped tum lagao ek ped hum lagaye or hariyali bharpur karen....

    Bahut hi achi rachna........

    Jai hind jai bharat

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  11. आपकी चिंता जायज है सराहनीय ...

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  12. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...संध्या जी..

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  13. छूना चाहती हूँ पास से,
    सोचती हूँ उसे देखकर,
    जब मैं पुकारूँ तो,
    आयेगा वह इस धरती पर,
    अगर नहीं आ सका,
    तो बुला लेगा मुझे वहां,
    सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है...........संध्या जी..

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  14. सुन्दर कविता.बेहतरीन शब्दों का चयन बधाई

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  15. भावनाओं से भरपूर.....
    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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  16. धरती कि पीड़ा को कहती अच्छी पास्तुती ..जहाँ जो है वहीं खुश रहे

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  17. पर्यावरण की चिंता को सही तरीके से रचना के मध्यम से रक्खा है ...

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  18. भावनाओं से भरपूर.**** हार्दिक शुभकामनायें.

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  19. ओ मेरे प्यारे से चाँद,
    तुम जहाँ हो वहीँ रहो,
    मेरी दुआ है,
    पीड़ा इस धरती सी
    कभी ना सहो....
    ...बहुत बढिया अर्थपूर्ण प्रस्तुति!

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  20. सुन्दर कविता.... सार्थक भाव...
    सादर...

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  21. सुंदर भावाभिव्यक्ति के लिए आभार

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  22. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  23. बहुत खूब लिखा है आपने !शानदार और सार्थक रचना!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  24. सार्थक संदेश देती हुई कविता.

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  25. .




    आदरणीया संध्या जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    ओ मेरे प्यारे से चांद,
    तुम जहां हो वहीं रहो,
    मेरी दुआ है,
    पीड़ा इस धरती सी
    कभी ना सहो....

    बहुत सुंदर रचना है … पर्यावरण के प्रति आपकी उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति ! आभार !

    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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