बुधवार, 20 जुलाई 2011

मैं संसार सजाना चाहती हूँ...." संध्या शर्मा


अन्याय की धुआंधार बारिश में,
संघर्ष वृक्ष के बीज का,
तू अंकुर बन,
जड़ जमा ले गहरे तक और,
फल - फूल,
तूफान उठें, या
गरजें बादल,
तुझे आकाश छूना है,
अपने जैसे असंख्य बीजों को,
जन्म देना है.
"मैं एक वृक्ष नहीं, 
 जंगल उगाना चाहती हूँ...
 एक बाग नहीं,
संसार सजाना चाहती हूँ...." 

29 टिप्‍पणियां:

  1. snagherso ke beech ek nayi alakh jarur jagegi , jab aap itni sunder rachna likhengi to kaun vidrohi na ban jayega.........sab nyaya ke liye vidroh ker denge.bahut sunder aur bahut hi sarthak rachna ............badhai

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  2. बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति आपके शब्द बहुत प्रभावित करते है
    यही बनती जा रही है तुम्हारी विशेषता | खुशी होती है ऐसी रचनाओं को पढ़ कर |

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  3. "मैं एक वृक्ष नहीं,
    जंगल उगाना चाहती हूँ...
    एक बाग नहीं,
    संसार सजाना चाहती हूँ...."
    .....हर शब्द बोलता हुआ बहुत खूब शब्द संयोजन बहुत कमाल का खुबसूरत रचना .......संध्या जी

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  4. अपने जैसे असंख्य बीजों को,
    जन्म देना है.
    "मैं एक वृक्ष नहीं,
    जंगल उगाना चाहती हूं

    बहुत सुंदर भाव
    बधाई

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  5. संघर्ष वृक्ष के बीज का,... जंगल खूब घना हो ... अच्छी प्रस्तुति

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  6. बहुत सुन्दर सृजनमयी - प्रण से भरी रचना रची है आपने संध्या जी .आभार

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  7. मुश्किलें चाहे कितनी आये, ज़िन्दगी नहीं रुकती, वो हमेशा फलती फूलती है.
    ---------------------------------------------
    मैंने आपको फोल्लो किया है,

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  8. बहुत प्रभावित कर रही है आपकी ये रचना,
    सादर,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  9. अपने जैसे असंख्य बीजों को,
    जन्म देना है.
    "मैं एक वृक्ष नहीं,
    जंगल उगाना चाहती हूं

    बहुत सुंदर भाव
    बधाई

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  10. बेहतरीन।
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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  11. Bahut hi gahri abhi waykti.
    Jai hind hai bharatBahut hi gahri abhi waykti.
    Jai hind hai bharat

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  12. Bahut hi achi rachnaye likhti hai mam aap...padh kar acha lagta hai
    jai hind jai bharatBahut hi achi rachnaye likhti hai mam aap...padh kar acha lagta hai
    jai hind jai bharat

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  13. बहुत सुन्दर ही नहीं कमाल की अभिव्यक्ति है आपकी ,संध्याजी.
    उत्साह और आक्रोश से ओतप्रोत.
    आभार.
    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,नई पोस्ट पर आपका स्वागत है.

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  14. pahli bar aapko pad rahaa hun....
    bahut achha laga..
    gahre vichar aur gahri abhivyakti.....
    mere blog par aapka swagat hai....

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  15. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति बधाई इसी विषय पर मेरी रचना" आक्रोश का बीज" भी है

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  16. आप की कविता जहाँ समाज को आंदोलित करती है वहीँ आप के मन का ज्वारभाटा जो लावा उगल रहा है --निसंदेह कविता सुन्दर है.

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  17. मैं एक वृक्ष नहीं,
    जंगल उगाना चाहती हूँ...
    एक बाग नहीं,
    संसार सजाना चाहती हूँ....

    अच्छी कामना है.

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  18. सार्थक सोच से भरी बहुत सुन्दर रचना..

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  19. सुन्दर विचारों से लैस उत्कृष्ट कविता संध्या जी बधाई

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  20. "मैं एक वृक्ष नहीं,
    जंगल उगाना चाहती हूँ...
    एक बाग नहीं,
    संसार सजाना चाहती हूँ...."

    काश सबके मन में यही भावना हो...
    बहुत खूबसूरत....

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  21. बहुत प्यारी अनुकरणीय आशा...
    शुभकामनायें आपको !

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  22. कल 27/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  23. मन की ये आग[जल्दी मे उपयुक्त शब्द नही मिला, कलमाडी की तरह मुझे भी भूलने की बीमारी हो गयी है]। आगे बढने की प्रेरणा देती है सुन्दर रचना।। ये तमन्ना यूँ ही जवान रहे और आप सुन्दर सा संसार बनायें। शुभकामनायें

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  24. तूफान उठें, या गरजें बादल,
    तुझे आकाश छूना है,
    अपने जैसे असंख्य बीजों को,
    जन्म देना है...
    अद्भुत सुन्दर पंक्तियाँ! गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ ज़बरदस्त रचना लिखा है आपने!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/

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  25. 'मैं एक वृक्ष नहीं
    जंगल उगाना चाहती हूँ ...
    एक बाग़ नहीं,
    संसार सजाना चाहती हूँ...
    .............................पावन दृढ़ संकल्प की उत्तम रचना

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  26. "मैं एक वृक्ष नहीं,
    जंगल उगाना चाहती हूँ...
    एक बाग नहीं,
    संसार सजाना चाहती हूँ....
    ...सार्थक सोच से भरी बहुत खूबसूरत रचना.
    शुभकामनाये..

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