गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

मुझे डर है... संध्या शर्मा

दरअसल मैं रेगिस्तान में ही पैदा हुई हूँ 
और तुम
ले जा रहे हो मुझे सागर में
मुझे प्यास नहीं कोई चाह नहीं
हाँ डर है...!
कहीं सागर निगल न ले
मेरे अस्तित्व को

ध्यान से देखो मुझे मैं तो पत्थर हूँ
और तुम
ले जा रहे हो मुझे हिमशिखर पर
पारस बनने की चाह नहीं
हाँ डर है 
कहीं पिघल ना जाऊं 
मोम बनकर...!

मैं तो एक बूँद हूँ, नन्ही सी ओस की
और तुम
बनाना चाहते हो बदली
नहीं घिरना चाहती झूमकर
हाँ डर है
कहीं बरस ना जाऊं
और समा जाऊं धरती में हमेशा के लिए...! 
 


 
 
 

26 टिप्‍पणियां:

  1. अस्तिव के खोने का डर!!!

    अदभुद भावाव्यक्ति..
    सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर सार्थक प्रस्तुति। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अस्तित्व से परे होने में डर लगता है

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपने आप क्यों खो दे ..... ? गहरी अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  5. मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहिए
    कि दाना खाक में मिलकर,गुले-गुलजार होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर प्रस्‍तुति।
    अपने अस्तित्‍व की लडाई लडती रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर रचना.सार्थक प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  8. ध्यान से देखो मुझे मैं तो पत्थर हूँ
    और तुम
    ले जा रहे हो मुझे हिमशिखर पर.........

    अपने यहाँ पत्थर ही पूजे जाते हैं ...बात विश्वास और आस की हैं ...उम्मीद रखे अपने वजूद पर ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  9. ये डर ही हमें हर हाल में जिन्दा भी रखता है .. अति सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं
  10. बिलकुल ताजे बिम्बों ,प्रतीकों के साथ लिखी अच्छी कविता |संध्या जी बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत ही बढि़या भाव संयोजन ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह....सुन्दर शब्दों में गहन अभिव्यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. अपने अस्तित्व से दूर जाने में सच में डर लगता है..सुंदर अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत ही गहरी और भावपूर्ण अभिवयक्ति.........

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत सुन्दर रचना, ख़ूबसूरत भावाभिव्यक्ति , बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  16. सुन्दर रचना , मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है|

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत खूबसूरत शब्दों में पिरोई गई रचना सुन्दर शब्द संयोजन |

    उत्तर देंहटाएं
  18. सुंदर कविता
    मैं तो एक बूँद हूँ, नन्ही सी ओस कीऔर तुमबनाना चाहते हो बदलीनहीं घिरना चाहती झूमकरहाँ डर हैकहीं बरस ना जाऊं
    संध्या जी बेहद ख़ूबसूरती से अलफ़ाज़ दिए है

    उत्तर देंहटाएं
  19. मैं तो एक बूँद हूँ, नन्ही सी ओस की
    और तुम
    बनाना चाहते हो बदली
    नहीं घिरना चाहती झूमकर
    हाँ डर है
    कहीं बरस ना जाऊं
    और समा जाऊं धरती में हमेशा के लिए...!
    Wah! Kya likha hai!

    उत्तर देंहटाएं
  20. अस्तिव के खोने का डर... सुन्दर शब्दों में गहन अभिव्यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं