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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

अनवरत आशा....



घंटाघर की घड़ियों को
बड़े गौर से देखते हुए
एक बुज़ुर्ग से
मैंने जानना चाहा
उनकी उत्सुकता का कारण
तो वे मुस्कुराते हुए बोले
छियासठ बरस हो गए
आशा - विश्‍वास जल से सींचते
मेरी आशा के मुरझाते बिरवे में
एक कोंपल फूटी है
हो न हो  .......
मेरे जीवन के अंत तक बदल जाए
उम्‍मीद पर तो दुनिया कायम है
और चल दिए मुस्कराहट बिखेरते
गुनगुनाते हुए वही पुरानी सी कविता
"घंटाघर में चार घड़ी 
चारों में जंजीर पड़ी
जब-जब घंटा बजता है
खड़ा मुसाफिर हँसता है"
वो सुबह कभी तो आएगी ……।