रविवार, 1 जून 2014

नियती...



नियती घट की
अंतिम बूंदों सी
विदा बेला पर
जीवन रेखा के
समाप्ति काल तक
ऐसे लगी रहेगी
दृष्टि उस द्वारे पर
जैसे कोई मोर
व्याकुल नेत्रों से
बैठ तकता है
घिर-घिर बरसते
रिक्त होते मेघ को
जैसे कोई चातक
प्यासा तरसता है
स्वाति की बूँद को
और ..........!
गुजर जाता है
एक महायुग...

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस मायायुग की प्रतीक्षा भी लम्बी लगती है ...
    गहरे भाव ...

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  2. बहुत गहन और सुन्दर अभिव्यक्ति ......
    जैसे कोई चातक
    प्यासा तरसता है
    स्वाति की बूँद को

    अह्ह्ह बस यही प्यास होनी चाहिए |

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  3. और वह क्षण कभी हाथ नहीं आता...

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  4. कितने बेबस है इसके आगे सब.. सुन्दर रचना संध्या जी .

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  5. आस है... जाती नहीं..सुन्दर रचना.

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