सोमवार, 4 अगस्त 2014

सहचर रास्ते ...

पथ से बिना डिगे 
हर स्थिति
हर तकलीफ से
जूझते हुए हर रात
तारों के साथ
बतियाती हूँ/बिताती हूँ
रात कटती है
हर पल
राह बनाते 

नए ख्वाब बुनते 
हर सुबह चलती हूँ
उन राहों पर
साथ उजालों के
क्योंकि...
मंज़िल तो ठहराव है

और रास्ते 
सदा साथ होते हैं
अनवरत 

साये की तरह
सहचर बन कर
जीवनपर्यंत...


11 टिप्‍पणियां:

  1. जारी रहे यात्रा .... सार्थक, सकारात्मक भाव

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  2. वाकई यह यात्रा अनवरत है। इस भावना को बनाए रखें। किसी की आवश्‍यकता भी नहीं होगी।

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  3. मंजिल ठहराव है, एक जगह ठहरा देती है। रास्ता हर वक्त कुछ न कुछ नए अनुभव देता है क्योंकि जो सतत चलता है वह दुनिया और जिन्दगी दोनों को करीब से देखता है और अनुभव करता है।

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  4. हर राह की कहानी देखते सुनने रहने पर ही यात्रा की असल तृप्ति है. सुन्दर रचना.

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  5. मंजिल पर जो रुक गया वह चूक गया नई नई मंजिलों से...सुंदर भावपूर्ण रचना..

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  6. रास्ते जरूर रहते हीन साथ पर साए ... वो तो अक्सर साथ छोड़ जाते हैं अँधेरे में ...
    बहुत खूब ...

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  7. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ
    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें....

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  8. वाह !!! बहुत सुन्दर रचना ----
    जीवन का सार्थक सच कहती हुई ---
    बधाई ----

    आग्रह है ---
    आवाजें सुनना पड़ेंगी -----

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