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शनिवार, 5 जुलाई 2014

करतब...



मुक्ति पा लेता है........!
अपराधी एक बार सूली पर चढ
वह निरपराध पेट की खातिर
सूली पर चढती है रोज - रोज
रस्सी पर डगमगाते नन्हे पाँव
किसी के लिए मनोरंजन भले हो
इसके लिए साधन है पेट भरने का
मौत के खेल को तमाशा बना
नन्हे नन्हे कदम आगे बढाती वह
जब सुनती है तालियों की आवाजें
तो डर से सहम सी जाती है 
बहकने लगती उसकी चाल
वह तुरंत साध लेती है खुद को
क्योंकि डगमगाना कारण बन जाएगा
उसके परिवार के भूखे रहने का
अभी उसे तो उस पार जाना है
जीवन और मृत्यु का करतब दिखाना है
और रोज जीतना है मृत्यु को
निरपराध होकर भी 
यही नियति है……………।

रविवार, 6 अप्रैल 2014

धुंधकारी...



 
सोचो जरा  
उन्हें भी तो चाहिए 
उगते सूरज की
उजली किरणें 
शोषण से मुक्ति 
अपने बनते हो न 
चलो तुम्ही बताओ 
किस श्रेणी में रखूं तुम्हे
शोषक या शोषित 
कभी मौन होकर 
देखते हो उन्हें 
तिल-तिल जलते 
कभी घमंड बोलता है 
तो कभी काले फीते 
कभी सुनाई दे जाते 
लाल झंडे के गीत 
इन सब के बीच 
चुक जाती है
धीरे - धीरे...!!!
आम इंसान की
रेंगती सी ज़िंदगानी 
प्रश्न उठता है  ....
होगा क्या …?
शोषितों के हित में 
व्यवस्था परिवर्तन ??
व्यक्ति परिवर्तन??
या फिर से सुनाई देगा 
कुछ समय बाद 
वही पुराना राग 
जलने वाला जलेगा 
और जलाने वाला 
सरकाता रहेगा  
गीली लकड़ियाँ
धुंधकारी होकर ………

बुधवार, 2 जनवरी 2013

मुक्ति... संध्या शर्मा

मुक्त करती हूँ तुम्हे 
हर उस बंधन से 
जो बुने थे 
सिर्फ और सिर्फ मैंने 
शायद उसमे 
ना तुम बंध सके 
ना मैं बाँध सकी 
निकल जाना है  
अलग राह पर 
लेकर अपने 
सपनो की गठरी 
जिसे सौपना था तुम्हे 
खोलना था बैठकर 
तुम्हारे सामने 
लेकिन अब नहीं...!
क्योंकि जानती हूँ 
गठरी खुलते ही 
बिखर जायेंगे 
मेरे सारे सपने 
कैसे समेटूंगी भला 
दोबारा इनको 
और हाँ...! 
इतनी सामर्थ्य नहीं मुझमे 
कि समेट सकूँ इन्हें 
इसीलिए ...
कसकर बांध दिया है 
मैंने उन गाठों को 
जो ढीली पड़ गईं थी
मुझसे अनजाने में 
अच्छा अब चलती हूँ 
अकेले जीना चाहती हूँ 
बची - खुची साँसों को 
हो सकता है...?
तुम्हे मुक्त करके 
मैं भी मुक्ति पा जाऊं....

शनिवार, 21 जुलाई 2012

मुक्ति...?---- संध्या शर्मा


जन्म से आज तक 
हर नाता हर रिश्ता
मांगता रहा मुझसे
बीत गया जीवन
पूरी करते अपेक्षा
ख़ुशी से देह छोड़
बनना पड़ा शिला
धूप हवा बारिश
सब झेलकर भी
अपेक्षा के भार से
मुक्त रहा युगों तक
अचानक एक दिन
खंडित किया मुझे
ले आये उठाकर
रहा अब भी पत्थर
लेकिन मंदिर का
तब से कतार है
मेरे समक्ष लम्बी
दिन - रात मांगते
लोग कुछ न कुछ
फिर दबाने लगे
अपेक्षाओं तले
अपेक्षाओं तले दबकर
फूट जाऊँगा एक दिन
उड़ जाऊंगा माटी बन
दसों दिशाओं में
समाप्त हो जायेगा
मेरा अस्तित्व
उड़ेगा धूल बन
हवा के संग - संग
क्या वही होगी 
सच्ची मुक्ति...?