गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

जीवन संध्या....संध्या शर्मा

सुबह से शाम
चलते-चलते
थक गया तन
सुनते-सुनते
ऊबा मन
आँखें नम
निर्जन आस
भग्न अंतर
उद्वेलित श्वास
बहुत उदास
कुछ निराश
शब्द-शब्द
रूठ रहे हैं
मन प्राण
छूट रहे हैं
पराया था
अपना है
कभी लगता
सपना है
सूरज जैसे
अस्त हो चला
अंतिम छंद
गढ़ चला.................!

20 टिप्‍पणियां:

  1. सूरज जैसे
    अस्त हो चला
    अंतिम छंद
    गढ़ चला.................!

    अद्भुत....

    बहुत सुन्दर रचना संध्या जी..
    सस्नेह
    अनु

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ,,,,,,संध्या जी,,,

    जीवन में होती सदा,आती सुबहो शाम
    थक जाता है अंत में,गढ़ जाता है नाम,,,,

    MY RECENT POST: माँ,,,

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  3. वाह,छायावाद की अद्भुत छाया।अति सुंदर भाव।

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  4. छंद और गढ़े जाएँगे
    आशा के पल्लव लहराएँगे ॥

    सुंदर अभिव्यक्ति

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  5. आँखें नम निर्मल आस ---
    बहुत भावपूर्ण |
    आशा

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  6. बहुत उदास
    कुछ निराश
    शब्द-शब्द
    रूठ रहे हैं
    मन प्राण
    छूट रहे हैं...........

    जब कभी मन में निराशा घर कर ले तो किसी का ये शेर मेरा मनोबल बढाता है।देखिये:-
    जब कभी हाथ से उम्मीद का दामन छूटा .
    ले लिया आपके दामन का सहारा हमने .
    बस अल्लाह तआला से दुआ मांगते हुए उक्त शेर कहिये ,निराशा,आशा में तब्दील हो जाएगी .
    आप तो वैसे भी बड़ी ऊर्जावान और रचनात्मक लेखन वाली लेखिका हैं फिर निराशाजनक भाव क्यों?

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  7. सूरज जैसे
    अस्त हो चला
    अंतिम छंद
    गढ़ चला......

    अंतःकरण को शब्द देती भावनाओं की अभिव्यक्ति .

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  8. कवि मन जीवन के उतार चढ़ावों बहुत ही महीनता से पकड़ता हे. इसीलिए कहते हैं " जहाँ न जाये रवि, वहां जाये कवि. किसी भी कवि के काव्य में भावों के आरोह अवरोह उसके समस्त जीवन की गाथा स्वत: कहते हैं, अच्छे भाव हैं, निर्वाण के....... शायद बुद्ध ने भी यही सोचा होगा..... बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व

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  9. बेहद प्रभावशाली रचना है बधाई स्वीकारें

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  10. इस अवस्था से न गुजरे मन तो सूर्योदय का अर्थ भी अस्त हो जाता है ...

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  11. सरल शब्दों में लिखी सुन्दर रचना |

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  12. सहज सब्दों से मन को अभिसिंचित करती कविता

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  13. मन के भावो का सुन्दर चित्रण..

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  14. जीवन संध्या वो बेला होती है जब दिनभर के सफ़र के बाद यात्री पलट कर देखता है तो सबकुछ साफ-साफ दीखता है.. आपने उसे सुन्दर शब्द दिया है..

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  15. वाह,.... बहुत ही सुन्दर लगी पोस्ट ।

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  16. सूरज जैसे
    अस्त हो चला
    अंतिम छंद
    गढ़ चला.................!

    ...वाह! एक एक शब्द अंतस को छू गया...शब्दों और भावों का अद्भुत संगम...

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  17. सुन्दर एवं प्रभावी रचना...
    :-)

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