मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

ये जीवन है???... संध्या शर्मा




हर रोज बैठे रहते हैं अकेले
कभी टी वी के निर्जीव चित्र देखते
कभी मोटे चश्मे से अखबार छानते
एक वक़्त था कि फुर्सत ही न थी
एक पल उसकी बातें सुनने की
आज कितनी याद आती है वह
वही सब मन ही मन दोहराते
बीच-बीच में नाती से कुछ कहते
क्या कहा कोई सुनता नहीं
अभी - अभी बहु ने गुस्से से
ऐसे पटकी चाय की प्याली
फूटी क्यों नहीं वही जानती होगी
बेटों ने ऐसे कटाक्ष किये कि
जख्मों पर नमक पड़ गया 
तन-मन में सुलगती आग
फिर भी गूंजी एक आवाज़
"बेटा शाम को घर कब आएगा"
ठण्ड से कांपता बूढ़ा शरीर
सिहर उठता है रह-रह कर
अपनी ही आँखों के आगे 
अपने शब्द और अस्तित्व
दोनों को  धूं -धूं करके

गुर्सी की आग में जलते देख
जो उड़कर बिखर रहे हैं 
वक़्त क़ी निर्मम आंधी में
कागज़ के टुकड़ों क़ी तरह...

30 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य का व्यान करती बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति ...

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  2. कड़वा सच....
    बेहद मर्मस्पर्शी...

    सस्नेह
    अनु

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  3. हमारे गाँव में एक कहावत है पका आम अच्छा लगता है किन्तु पका रिश्ता अर्थात अनुभवी रिश्ता खल जाता है .ऐसा क्यों ये वक़्त हि जाने? लेकिन मन को नई सोच देने वाली रचना

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (12-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  5. एक कटु सत्य...बहुत मार्मिक....

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  6. यथार्थ का सही चित्रण किया है संध्या जी |
    आशा

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  7. वृध्द अवस्था की दशा की वास्तविक चित्रण : बहुत अच्छा और शाश्वत रचना
    मेरी नई पोस्ट "गजल "

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  8. संध्या दी यथार्थ का खूबसूरत चित्रण, हृदयस्पर्शी रचना

    अरुन शर्मा

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  9. सार्थकता लिये बेहद सशक्‍त लेखन ... आभार

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  10. बहुत ही मर्मस्पर्शी और गहन पोस्ट ............हैट्स ऑफ इसके लिए ।

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  11. ये कडुवा सच है जिसको मानना ही पड़ता है ...
    सचाई का चित्रण ...

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  12. वास्तविकता के धरातल पर खरी उतरती और आधुनिकता को आइना दिखाती कविता, अति सुंदर!

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  13. उम्र का यह पड़ाव सभी के साथ आना है...भावपूर्ण प्रस्तुति आभार...

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  14. उम्र के इस पड़ाव की वास्तविकता कहती गंभीर रचना

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  15. सादर आमंत्रण,
    आपका ब्लॉग 'हिंदी चिट्ठा संकलक' पर नहीं है,
    कृपया इसे शामिल कीजिए - http://goo.gl/7mRhq

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  16. इतनी संवेदनशील कविता की रचना के लिए बेहद संवेदनशील दृष्टि आवश्यक है आभार

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  17. उम्र के जिस पड़ाव में सबसे अधिक साथ की जरुरत होती है उस उम्र में उनकी उपेक्षा उनके लिये कितना दुखदायी होगा यह आसानी से समझा जा सकता है. बहुत भावपूर्ण संवेदनशील कविता.

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  18. कसक, टीस, या अंतर्मन की पीड़ा पर सब की नजर नहीं पड़ती।

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  19. अंतस की कसक बयां करती बेहद संवेदनशील, मर्मस्पर्शी कविता।।।।

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  20. कटु सत्य...
    बेहद मर्मस्पर्शी रचना...

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  21. संध्या जी आपकी इस रचना को कवितामंच पर साँझा किया गया है

    http://kavita-manch.blogspot.in

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