शुक्रवार, 6 मार्च 2026
हर एक सफर की कहानी लिखो... संध्या शर्मा
बुधवार, 3 दिसंबर 2025
ये क्या है...? संध्या शर्मा
ये क्या है?
ये पुलक है, ये झंकार है,
ये अधूरे बोलों का संचार है।
ये चुप्पी में सिमटा कोलाहल है,
ये मन से उठता हालाहल है।
ये क्या है?
ये प्राणों का प्रासाद है,
नभ के तारों का नीरव संवाद है।
ये अस्तित्व की साँस लेती रागिनी है,
ये क्षण भर में सदियों की यात्रा है।
ये क्या है?
ये रोम-रोम में बहती गंग है,
ये मौन के मुख से फूटा गीत अभंग है।
ये दो पल की ओस, सदियों का सागर,
ये तुम्हारे होने का अनूठा अहसास है।
ये क्या है?
ये प्रेम नहीं, प्रेम का सोत है,
ये दिया नहीं, स्वयं ज्योत है।
ये वेदना में पलता परमानंद है
ये तुम हो... बस यही तो है।
बस चहुं ओर आनंद ही आनंद है।
बुधवार, 16 जुलाई 2025
एक ख़त बीते लम्हों के नाम... संध्या शर्मा
एक ख़त लिखना चाहती हूँ मैं,
उन गुजरे पलों के नाम,
जो छू गए थे मन को कभी
और खो गए थे वक़्त के अंधेरों में।
काग़ज़ पे उतर आएँगे,
कुछ धुंधले से चेहरे,
हँसती आँखें, अधूरे ख़्वाब
और वो बिखरी चुप्पियाँ।
हर शब्द होगा एक दर्द,
हर पंक्ति एक सिसकी,
मगर ये ख़त पढ़ेगा कौन?
वक़्त तो बहरा है...!
भेजूँगी नहीं इसे कहीं मैं,
रख दूँगी दिल की किसी कोठरी में,
जहाँ गूँजती रहेगी हर पंक्ति
एक अनसुनी कहानी की तरह।
बुधवार, 18 जून 2025
सहनशीलता का प्रकाश... संध्या शर्मा
जब शरीर की थकी लकीरें
आत्मा को घेर लेती हैं
और मन के कोलाहल में
एक सन्नाटा छा जाता है।
तब भीतर के मंदिर में
खड़ी होती आत्मा विनीत
उस निराकार से पूछती
जो है सबका अदृश्य नीड़।
"क्या कहा?" – केवल चुप्पी
"क्या सुना?" – केवल स्थिरता
उत्तर सतह पर अक्षर नहीं
न उठा कोई स्वर चमत्कारी।
उतरा वह अनुत्तर धीरे - धीरे
सहनशीलता की गहराई में
सागर सा विशाल विस्तार
पर्वत सी अडिग मजबूती।
एक ठहराव सा विश्वास
कि प्रत्येक रात के पश्चात
उगता सूरज नया प्रकाश
हर तूफ़ान के बाद शांति।
यह भाषा है बिना शब्दों की,
एक वरदान है बिना माँग का
सहनशीलता में छुपा ज्ञान
आत्मा को मिला परम उपहार
जब शब्द फीके पड़ जाते
तब सहनशक्ति बोलती है
भीतर के ईश्वर का स्वर
चुपचाप समाधान देता है।
धैर्य में छिपा है वह प्रकाश
जो दिखाता अँधेरे में मार्ग
आत्मा की थकान धुल जाती
जब बहती है सहनशीलता भक्ति के साथ...
---- संध्या शर्मा ----
शुक्रवार, 21 मार्च 2025
अमर काव्य, जीवन आधार... संध्या शर्मा
कविता, शब्दों का जादू,
भावनाओं की सरिता,
इसकी हर पंक्ति में छुपा है,
संसार, अद्भुत, अनोखा।
कभी खुशियों के रंग बिखेरे,
कभी गम की छाया ले आए,
कविता तो मन का आईना है,
जो दिल की बात कह जाए।
कभी तुकों में बंध बनती,
लय, छंदों में बहता संगीत,
ये तो आत्मा की भाषा है,
जो हर पल रचे नया गीत।
कलम से उतरती है ,
दिल की गहराई में जन्मती,
कविता तो अमर है,
हर युग में जीवंत रहती।
शब्द ब्रह्म अक्षर अनंत,
कविता है सृष्टि का सार,
हर पंक्ति में ब्रह्मांड बसा,
अमर काव्य जीवन आधार।
बुधवार, 5 जून 2024
हरियाली खुशहाली है... संध्या शर्मा
बच्चों आओ मैं हूँ पेड़
मुझे लगाओ करो ना देर
जब तुम मुझे उगाओगे
धरती सुखी बनाओगे
दुनिया मेरी निराली है
हरियाली खुशहाली है
रोको मुझपर होते प्रहार
मैं हूँ जीवन का आधार
छाँव फूल फल देता हूँ
तुमसे कुछ नही लेता हूँ
वायू जहरीली पीता हूँ
शुद्ध हवा तुम्हें देता हूँ
प्रकृति का सम्मान करो
वसुंधरा का तुम ध्यान धरो
मेरा मन भी बहुत रोता है
दुख मुझको भी होता है
अब तो मुझको ना काटो
टुकड़ों टुकड़ों में ना बांटो
मुझसे ही बनते हैं उपवन
मैं हूँ, तो जीवित हैं ये वन
देता हूँ पंछी को ठिकाना
और चिड़ियों को दाना
रूठी प्रकृति को मनाना
कहते थे ये दादा नाना
बात उनकी तुम मानोगे
घर - घर पेड़ लगाओगे
शुक्रवार, 8 मार्च 2024
मेरी मां सबसे प्यारी-संध्या शर्मा
हम तीन बहनों और एक भाई की मां। बहुत प्यारी, बहुत कुशाग्र बुद्धि वाली थी। मां ने राजनीति, समाज और गृहस्थी हर जगह अपनी कुशलता दिखाई। आज भी जबलपुर में 'इंद्रावती शर्मा' सिर्फ़ नाम ही काफी है उनकी कीर्ति को जानने के लिए।
हम बच्चों के पालन पोषण से लेकर शिक्षा, व्यवसाय, शादी विवाह हर फैसले उन्ही के होते थे, जो आज भी उनकी सफलता के प्रमाण हैं।
मां ने अपनी बेटियों ही नही बल्कि अनेक अनाथ बेटियों के विवाह अपने दम पर किए और आजन्म उनकी भी मां का फ़र्ज़ निभाती रही।
मां ने बेटियों पर शोषण के विरोध में समाज के सामने आकर आवाज़ उठाई और उन्हे उनका हक़ दिलाया।
उन्होंने बचपन में किस्से कहानियों के माध्यम से नैतिक शिक्षा दी हमे। चंदामामा, पराग, पंचतंत्र की कहानियां जैसी पुस्तकें हमारे लिए पढ़ना उनकी आज्ञा होती थी। रामायण की चौपाइयों से अंताक्षरी खेलती थी। काग चेष्टा, बकुल ध्यान, स्वान निद्रा जैसी सीख आज भी याद है। टंग ट्विस्टर सिखाती। ताश के खेल जिसमें ट्वेंटी नाइन उनका प्रिय खेल था! उनके जाने के बाद कभी नहीं खेल सके हम।
एक बार का किस्सा याद आता है। हम छोटे ही थे तब। पड़ौस की एक बहु के पैर में फ्रेक्चर के बाद प्लास्टर था, पैसे की कमी और परिवार की अनदेखी में वह उस प्लास्टर को समय सीमा के बाद भी मज़बूरी वश ढो रही थी! एक दिन वह मां के पास आई। मां ने उन्हें अस्पताल चलने को कहा तो उन्होंने कोई परेशानी बताई। मां ने अपने हाथों से प्लास्टर काट कर उन्हे उससे निजात दिलाई और कुछ दिनों बाद उन्हें ले जाकर डॉक्टर को दिखाया भी।
हर परेशानी का हल चुटकियों में करने वाली मां की दोनों किडनी खराब हो गई थी। बहुत तकलीफ़ उठाई उन्होंने। जब बीमारी का कोई इलाज़ ना हो तो इंसान इधर उधर किसी अन्य पैथी या चमत्कार के पीछे भागता है।
इसी के तहत एक बार किसी ने कहा कि कुछ ' उतारा' जैसा होता है, उसे करके चौराहे पर डाल दो। लेकिन अंधविश्वास को न मानने वाली मां ने सीधे सादे शब्दों में कहा था "मुझे ईश्वर ने जो कष्ट दिए हैं , मैं उसे उनकी इच्छा समझकर भुगतने को तैयार हूं, और मैं कभी भी नही चाहूंगी कि किसी दुश्मन को भी मेरे बदले ये कष्ट हो"
एक बार की बात है मां अर्धचेतना की अवस्था में डायलिसिस के लिए हॉस्पिटल में भर्ती थी। रात के लगभग दो बजे डॉक्टर ने उन्हें बॉल दबाकर उंगलियों की एक्सरसाइज करने कहा। हम सब परेशान थे कि इतनी रात को बॉल कहां से मिलेगी। घर भी काफ़ी दूर था। तभी मां ने धीरे से आंख खोली और भाई को पास बुलाकर धीरे से कहा बेटा! परेशान मत हो! रुई का गोला बना और पट्टियों को लपेटकर बॉल बना दे।" इतनी तकलीफ़ में भी अपने बच्चों की तकलीफ़ नही देख सकती थी वो मां।
अपने अंतिम समय में जब भी हम सब उनके लिए कोई उपाय करने में लगते वो कहती "गोइंठा में कितना भी घी डालोगे वो सूख जाएगा। मत डालो!" क्योंकि उन्हें समझ रहा था उनका इलाज़ करवाना आसान नहीं है।
capd करवाया गया था उनका। साधारण डायलिसिस उनका शरीर झेल नही पा रहा था। सारी सावधानियों के बाद भी उन्हें इन्फेक्शन हो गया। बहुत कोशिश की गई।
मैं नागपुर में ही थी। मां ने अंतिम बार मुझसे फोन पर बात की! मुझे उनकी आवाज़ में इतना दर्द महसूस हुआ कि मैने उस समय ईश्वर से प्रार्थना की "हे ईश्वर मां को अपने पास बुला ले। हमारे लिए इतनी तकलीफ़ में मत जीने दे उसे। मत रोने दे उसे दर्द सह सहकर! अब मां नही हम रो लेंगे!"
और इस तरह मैं अंतिम बार उनके वो शब्द"बेटा तू आ जा मेरे पास" भी नही सुन पाई!
ईश्वर भी जैसे बस हमारे कहने की राह देख रहा था। सिर्फ़ पचास की छोटी सी उम्र में मां ईश्वर के पास चली गई।
मां की हर सीख याद है मुझे। हर समस्या का हल उन्हे, उनकी बातों को याद करते हल करती हूं। हर पल उन्हे महसूस करती हूं। अब तो आईने में भी माथे पर पड़ती लकीरों में वो दिखाई देने लगी है ।
सब कहते हैं मैं मां सी हूं। बहुत कोशिश करती हूं, कि मां जैसी बनूं। लेकिन नही बन सकती मैं उसके जैसी मैने कहा न "मेरी मां सबसे प्यारी"
संध्या शर्मा
शनिवार, 22 अप्रैल 2023
अकती पूजन कैसे जाऊँ री, बरा तरें ठाडे लिवौआ...
हिंदू धर्म में प्रकृति के सभी तत्वों की पूजा, प्रार्थना का प्रचलन और महत्व है, क्योंकि हिंदू धर्म मानता हैं कि प्रकृति से ही हमारा जीवन संचालित होता है। इसीलिए प्रकृति को देवता, भगवान और पितृदेव माना गया है। हिन्दू संस्कृति के अधिकतर तीज त्योहार और पर्व परंपराएं प्रकृति से ही जुड़ी हुई हैं। ऐसा ही एक त्यौहार है "अक्षय तृतीया"
अक्ति, अकती, अक्षय तृतीया, आखा तीज ...अनेक नामों से जाना जाने वाला यह त्यौहार बुंदेलखंड में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। बैशाख मास के शुक्ल पक्ष में तीज के दिन का यह पर्व कुंवारी कन्याओं एवं विवाहित महिलाओं के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस पर्व को कृषक भी बड़े उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाते हैं। सबसे पहले चार कलशों में पानी भरकर, पूरे गए चौक पर रखा जाता है। इन घड़ों पर वर्षा के चार माहों- क्रमशः असाढ़, सावन, भादों तथा कुंआर के नाम लिखे जाते हैं। इन घड़ों पर अमियाँ (कच्चे आम) और रोटियाँ रखी जातीं हैं तथा प्रत्येक घड़े में चनों के दाने डाल दिए जाते हैं।
तत्पश्चात पूजा-होम आदि करके प्रतीक्षा की जाती है। दूसरे दिन जिस घड़े के चने फूल जाते हैं, उस घड़े पर अंकित मास में ही वर्षा होगी, ऐसा अनुमान व विश्वास किसानों में होता है। इस तरह ही इस त्यौहार से कृषि-वर्ष का आरम्भ माना जाता है। गाँव का मुखिया ’बसोरों’ से बाजा बजवाता हुआ किसानों के साथ खेत पर नया ’बखर’ लेकर जाता है। पंडित या पुजारी उस बखर की पाँस पर गोबर और हल्दी लगाकर पूजन करता है।
इसके बाद खरीफ फसल के अन्नों- ज्वार, उड़द, मूँग, तिल, मक्का आदि के दाने और सवा रुपया बखर पर रखकर मुखिया/जमींदार पूजन करता है। रुपये, दाने और मिट्टी को अपने हाथ से उठाता है और उन दानों को खेत में बोकर हल/बखर चलवा देता है। ऐसे ही अन्य किसान भी अपने-अपने खेतों पर जाकर करते हैं। अंत में सभी लोग मुखिया या जमींदार के घर जाते हैं, जहाँ उन्हें पान और स्त्रियों को घुघरी (उबले हुए गेहूँ तथा चने) दी जाती है।
कन्यायें और स्त्रियाँ संध्या होते ही ’अकती’ के गीत गाते हुए किसी सरोवर या नदी पर जाती हैं और सोन (भीगी हुई चना दाल) वितरित करतीं हैं। कन्यायें पुतला पुतलियाँ सजातीं हैं। वट वृक्ष के नीचे उनका विवाह और पूजा करतीं हैं। स्त्रियाँ परस्पर हास्य-विनोद करती हुई, अपने-अपने पतियों के नाम जोड़कर इस प्रकार हंसी ठिठौली करती हैं-
’टाठी भरो घिऊ, हमाओ और ........ को एकई जिऊ।’
इसी प्रकार नवविवाहित किशोरियाँ भी ’दिनरियाँ’ या ’दुलरियाँ’ इन शब्दों में गाती हैं-
’अकती खेलन कैसे जाऊँ री,
बरा तरें ठाडे लिवौआ।
मेले री मेले मोरी सकियन के मेले।
ससुरा के संग न जाऊँ री,
बर तरें ठाडे लिवौआ।’
अक्ति के लान कैसे जाऊँ री ,
जे राजा रो रये हिलकिया
रो रये हिलकिया
लाल करें अँखियाँ ….
बेटियों के लिए यह त्यौहार आजन्म अपने बचपन की मीठी यादों की पोटली समान होता है। यह त्यौहार आते ही कल्पनाओं में चलचित्र की भांति विचरने लगते हैं वो प्यारे - प्यारे गुड्डे - गुड़ियाँ, जिनका ब्याह रचाने की तैयारियों में न जाने कब बीत जाता है सखियों संग हंसी - ठिठौली करते वो सुनहरा सा बचपन...
विवाह गुड्डे गुड़िया का होता है परन्तु घर में उत्साह विवाह जैसा ही होता है। गुड्डा-गुड़िया के विवाह से बच्चों को गृहस्थी की सीख मिलती है कि आने वाले समय में वे कुशल माता-पिता बनकर अपनी संतति, परिवार एवं समाज व देश के प्रति अपने दायित्यों का निर्वहन सफ़लता से करें। एक तरह से यह समाज के लिए उत्तम नागरिक बनाने की प्रक्रिया है।
शहरों में तो मिट्टी का घड़ा कभी भी खरीद कर लोग पानी पीना शुरु कर देते हैं, परन्तु ग्रामीण अंचल में यह परम्परा आज भी जीवित है कि अक्ति के दिन से नये घड़े का जल पीना प्रारंभ किया जाता है।
"पीहर' याद आता है
माँ' याद आती है
अक्ती की पुतरियाँ
इशारों से बुलाती हैं
"आज भी जब नए घड़े के पानी से
सोंधी-सोंधी खुश्बु आती है ..."
अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु के छठें अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। परशुराम ने महर्षि जमदाग्नि और माता रेनुकादेवी के घर जन्म लिया था। यही कारण है कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। इस दिन परशुरामजी की पूजा करने का भी विधान है।
अक्षय तृतीया के दिन ही पांडव पुत्र युधिष्ठर को अक्षय पात्र की प्राप्ति भी हुई थी। इसकी विशेषता यह थी कि इसमें कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था।
अक्षय तृतीया के अवसर पर ही महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत लिखना शुरू किया था। महाभारत को पांचवें वेद के रूप में माना जाता है। इसी में श्रीमद्भागवत गीता भी समाहित है।
अक्ति का त्यौहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस दिन पितरों का पिंड दान किया जाता है। जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कुल में मिलाने का कार्य भी इसी दिन होता है। इस दिन पितर कुल में मिले हुए को आगामी पितृपक्ष में पिंड दान दिया जाता है, अन्य पितरों के साथ उसका भी तर्पण किया जाता है।
मान्यता हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है।
इस तरह समस्त अंचल में अक्ति (अक्ष्य तृतीया) धूम धाम से मनाया जाता है।
भले ही हम आधुनिक युग के भौतिक प्रपंचों में उलझकर परम्पराओं से विरक्त हो रहे हैं, परन्तु इन परम्पराओं का निर्वहन हमें अपनी माटी से जोड़ता है। अपनी संस्कृति से, अपने पुरखों से जोड़ता है, अपने इतिहास एवं समाज से जोड़ता है। इसलिए हमें अपने परम्परागत त्यौहारों को कभी नहीं भूलना चाहिए।
शनिवार, 4 जून 2022
क़वायद .... ! - संध्या शर्मा
जब बारिश आती है
शुरू हो जाती है
क़वायद .... !
एक तरफ धरती की
दूसरी ओर इंसान की
धरा ढूंढती है कॉन्क्रीट के बीच
जल को आत्मसात करने की जगहें
और इंसान तलाशता है
पानी से बचने का ठौर
__संध्या शर्मा__
सोमवार, 23 अगस्त 2021
कजलियां-छोटन ने दई, बड़न ने लई, बारन के कानन में खोंस दई
कजलियां प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा पर्व है। इसका प्रचलन सदियों से चला आ रहा है। राखी पर्व के दूसरे दिन कजलियां पर्व मनाया जाता है। इसे कई स्थानों पर भुजलिया या भुजरियां नाम से भी जाना जाता है। श्रावण मास की अष्टमी और नवमीं तिथि को बांस की छोटी-छोटी टोकरियों में खेतों से लाई मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं के दाने बोए जाते हैं।
गेहूं की फसल बोने से पहले मनाए जाने वाले इस पर्व पर मिट्टी की उर्वरक शक्ति तथा बीजों की अंकुरण क्षमता परखी जाती है। अलग-अलग खेतों से लाई गई मिट्टी में घर में रखे गेहूं के बीज को बोया जाता है।
इससे जब कजलियां तैयार होती है तो किसानों की इस बात का अंदाजा लग जाता है कि खेत की मिट्टी और गेहूं का बीज कैसा है। यदि कजलिया मानक के अनरुप पाई गई तो किसान आश्वस्त हो जाते हैं कि बीज और खेत की मिट्टी गेहूं की फसल के लिए उपयुक्त है।
यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। तकरीबन एक सप्ताह में गेहूं के पौधे उग आते हैं, जिन्हें भुजरिया कहा जाता है।
श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। कजलियों (भुजरियां) के दिन महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए और गाजे-बाजे के साथ तट या सरोवरों में कजलियां विसर्जन के लिए ले जाती हैं।
तालाबों और तटों पर कजलियां खोंट ली जाती हैं और बची टोकरियों का विसर्जन कर कजलियां पर्व मनाया जाता है।
हरी-पीली व कोमल गेहूं की बालियों को आदर और सम्मान के साथ भेंट करने एवं कानों में लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
तालाबों व तटों पर कजलियां विसर्जन का मेला लगता है।
चारों ओर खरीददारी के लिए दुकानें सजती हैं।
सभी एक दूसरे की सुख - समृद्घि की कामना कर पुराने राग - बैर को भूलने का संकल्प करते हैं।
मेल मिलाप के इस पर्व पर लोग एक दूसरे को कजलियों का आदान प्रदान करते हैं। जो बराबरी के हैं, वे गले लगते हैं और जो बड़े हैं वे छोटों को आशीर्वाद देते हैं। बच्चों के कान में स्नेह और आशीष स्वरुप कजलियां खोंस दी जाती है।
कजलियों को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने मिलता है। बच्चों को कजलियां देने के बाद शगुन के रूप में बड़े उन्हें उपहार देते हैं। लोग सुख - दुख बांटने, मेल-मिलाप के लिए नाते-रिश्तेदार एक दूसरे के घर जाते हैं।
मान्यतानुसार इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय से है।
इस पर्व की प्रचलित जानकारी के अनुसार आल्हा की बहन चंदा श्रावण माह में ससुराल से मायके आई तो सारे नगरवासियों ने कजलियों से उनका स्वागत किया था। महोबा के सिंह सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान की वीरगाथाएं आज भी बुंदेलखंड में गाई जाती है।
उस समय राजकुमारी तालाब में कजली सिराने अपनी सखियों के साथ गई हुई थी। राजकुमारी को पृथ्वीराज से बचाने के लिए राज्य के वीर महोबा के वीर सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान ने वीरतापूर्ण पराक्रम दिखाया था। इन दो वीरों के साथ में चन्द्रावलि के ममेरे भाई अभई भी उरई से जा पहुंचें। कीरत सागर ताल के पास हुई लड़ाई में अभई को वीरगति प्राप्त हुई। उसमें राजा परमाल का बेटा रंजीत भी शहीद हो गया।
बाद में आल्हा-ऊदल, और राजा परमाल के पुत्र ने बड़ी वीरता से पृथ्वीराज की सेना को हराया और वहां से भागने पर मजबूर कर भगा दिया। महोबे की जीत के बाद पूरे बुन्देलखंड में कजलियां का त्योहार मनाया जाने लगा।
गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019
जल्दी आना ओ चाँद गगन के .....
शनिवार, 31 अगस्त 2019
मेरी नज़्म... संध्या शर्मा
ख़्वाबों की उड़ान भरकर
कितनी भी दूर क्यों न चली जाए
लेकिन लौट आती है "मेरी नज़्म"
उतर आती है ज़मी पर
मेरे साथ नंगे पाँव घूमती है
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल, बूटा -बूटा
इसलिए तो तरोताज़ा रहती है
जब कभी यादों के सात समंदर पार करके
थककर निढाल हो जाती है
तो बैठ जाती हैं मेरे साथ
साहिल की ठंडी रेत पर
जाने क्या लिखती - मिटाती
बड़ी शिद्द्त और ख़ामोशी से
देखती रहती है.....
ख्वाहिशों की तरह
लहरों का आना
और पत्थरों से चोट खाकर
बार-बार लौट जाना...
सोमवार, 19 अगस्त 2019
कौना सी गुइयाँ सासरें, माई सावन आये
बुधवार, 10 अगस्त 2016
रिमझिम के तराने लेकर आई बरसात …… संध्या शर्मा
शनिवार, 16 जुलाई 2016
बुंदेली लोकगीतों में जल का महत्व... संध्या शर्मा
पृथ्वी का अमृत जल को कहा गया है, अगर जल न हो तो यह वसुंधरा जल जाए। प्राणियों का अस्तित्व ही मिट जाए, इसलिए हमारे पूर्वजों ने जल का हमेशा सत्कार किया, उसकी महत्त्ता एवं उपयोगिता को समझ कर आने वाली पीढीयों को सचेत किया। है। जितने नाम जल के हैं, उससे अधिक उसका उपयोग है। आज बुंदेलखंड क्षेत्र जहाँ जल की कमी से जूझ रहा है वहीं प्राचीन काल में जल महत्व समझकर उसका गुणगाण किया जाता था और लोकगीतों के माध्यम से जन जागृति करने का कार्य भी किया है। रूमक-झुमक चले अईयो रे
साहुन के बदला रे
गह तन गगर कपत तन थर-थर
डरत धरत घट सर पर।
गगरी के लेते ही वह थर-थर काँपती है तथा सिर पर घड़ा रखते हुए डरती है। वह डर को छोड़ती ही नहीं है- क्योंकि पानी भरने में एक पहर का समय लगता है।
जैसे-
न मारो कांकरिया लाग जेहे
कांकरिया के मारे हमारी गगरिया फूट जेहे
गगरिया के फूटे हमारी चुनरिया भीग जेहे
चुनरिया के भीगे हमारी सासुइया रूठ जेहे
सासुइया के रूठे हमारे बालमवा रूस जेंहे
बलमवा के रूसे हमारो पिहरवा छूट जेहे
इस लोकगीत में जल से भरी गगरिया के फूटने पर प्रिय के रुठने को बड़े ही सहज व शालीन ढंग से दर्शाया गया है।
कौन की बहुआ कौन की बिटिया
कौन की नार कहाई हो
मोरी केवल माँ
दशरथ बहुआ, जनक की बिटिया,
नरबदा मैय्या होssss
नरबदा मैया ऐसी मिली रे
ऐसी मिली रे जैसे मिल गए
महतारी और बाप रेssss
नरबदा मैया होssss
मंगलवार, 4 दिसंबर 2012
जीवन एक किताब ... संध्या शर्मा
जीवन एक किताब
अधूरी सी ..........
आने वाला हर दिन
एक कोरा पन्ना
हर दिन लिखती हूँ
भावों की इबारतें
कभी भरती हूँ
आशाओं की सरिता
प्रवाहों के बीच पड़े
बड़े-बड़े पत्थर
उनपर जमी
वक़्त की काई
साथ चलते दो किनारे
पेड़ों की घनी कतारें
डालियों पर गूंजता
पंछियों का कलरव
सतरंगी किरणों को
पंखों में समेटे
फूल - फूल पर
मंडराती तितलियाँ
भंवरों का गुंजन
प्यारा सा गाँव
गुलमोहर की छाँव
रहट-रहट सी सांस
तिनका-तिनका आस
बैलों की रुनझुन
छप्पर-खलिहान
फूली सरसों
गमकते टेसू
बहती पुरवाई
उड़ती चूल्हे की राख
रंभाती गाय
मस्ती से उछलते बछड़े
बहती नदिया की
कल-कल धार
करती जीवन साकार
तो किसी पन्ने पर
पल्लू के कोने में बंधी
माँ की हिदायतें
कमरे से झाड़ी धूल
रसोई में पकते
खाने की खुशबू
चौकी-बेलन संग
खनकती चूड़ियों का
मिला-जुला राग

और भी न जाने
कितना कुछ है
अस्त-व्यस्त सा
समय कहाँ मेरे पास
सजाऊं-संवारूं इसे
मैं तो एक सैलानी हूँ
अतीत-वर्तमान को
रोज समेटती हूँ
इन पन्नो पर
समीक्षा के लिए
दे जाऊंगी समय को
उस दिन जब यह मेरी
जिल्द से लिपटी किताब होगी
तब यह सिर्फ मेरे नहीं
हर पढने वाले के हाथ होगी ........



