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शुक्रवार, 6 मार्च 2026

हर एक सफर की कहानी लिखो... संध्या शर्मा

हर एक सफर की कहानी लिखो,
दिल की धड़कनों की रवानी लिखो।

रास्तों में बिखरी है गुलों की महक,
बाद-ए-सबा की मेहरबानी लिखो।

कैसे मिलते हैं लोग कहीं दूर पर,
उस ताज़ा घड़ी की निशानी लिखो।

एक ख़त था जो अब बन गया दास्ताँ,
उस महबूब की सादा-जुबानी लिखो।

सोचती हूँ ये आँखें नम क्यों हुई,
उस दर्द की सच्ची बयानी लिखो।

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

ये क्या है...? संध्या शर्मा

 ये क्या है?

ये पुलक है, ये झंकार है,

ये अधूरे बोलों का संचार है।

ये चुप्पी में सिमटा कोलाहल है,

ये मन से उठता हालाहल है।


ये क्या है?

ये प्राणों का प्रासाद है,

नभ के तारों का नीरव संवाद है।

ये अस्तित्व की साँस लेती रागिनी है,

ये क्षण भर में सदियों की यात्रा है।


ये क्या है?

ये रोम-रोम में बहती गंग है,

ये मौन के मुख से फूटा गीत अभंग है।

ये दो पल की ओस, सदियों का सागर,

ये तुम्हारे होने का अनूठा अहसास है।


ये क्या है?

ये प्रेम नहीं, प्रेम का सोत है,

ये दिया नहीं, स्वयं ज्योत है।

ये वेदना में पलता परमानंद है 

ये तुम हो... बस यही तो है।

बस चहुं ओर आनंद ही आनंद है।

बुधवार, 16 जुलाई 2025

एक ख़त बीते लम्हों के नाम... संध्या शर्मा

एक ख़त लिखना चाहती हूँ मैं,  

उन गुजरे पलों के नाम,  

जो छू गए थे मन को कभी

और खो गए थे वक़्त के अंधेरों में।


काग़ज़ पे उतर आएँगे,

कुछ धुंधले से चेहरे,

हँसती आँखें, अधूरे ख़्वाब

और वो बिखरी चुप्पियाँ।  


हर शब्द होगा एक दर्द,

हर पंक्ति एक सिसकी,

मगर ये ख़त पढ़ेगा कौन?  

वक़्त तो बहरा है...!


भेजूँगी नहीं इसे कहीं मैं,

रख दूँगी दिल की किसी कोठरी में,

जहाँ गूँजती रहेगी हर पंक्ति

एक अनसुनी कहानी की तरह।  

बुधवार, 18 जून 2025

सहनशीलता का प्रकाश... संध्या शर्मा


जब शरीर की थकी लकीरें  

आत्मा को घेर लेती हैं

और मन के कोलाहल में  

एक सन्नाटा छा जाता है।  


तब भीतर के मंदिर में  

खड़ी होती आत्मा विनीत

उस निराकार से पूछती  

जो है सबका अदृश्य नीड़।  


"क्या कहा?" – केवल चुप्पी

"क्या सुना?" – केवल स्थिरता

उत्तर सतह पर अक्षर नहीं

न उठा कोई स्वर चमत्कारी।  


उतरा वह अनुत्तर धीरे - धीरे

सहनशीलता की गहराई में 

सागर सा विशाल विस्तार

पर्वत सी अडिग मजबूती।  


एक ठहराव सा विश्वास

कि प्रत्येक रात के पश्चात  

उगता सूरज नया प्रकाश

हर तूफ़ान के बाद शांति।  


यह भाषा है बिना शब्दों की,  

एक वरदान है बिना माँग का

सहनशीलता में छुपा ज्ञान 

आत्मा को मिला परम उपहार


जब शब्द फीके पड़ जाते

तब सहनशक्ति बोलती है

भीतर के ईश्वर का स्वर  

चुपचाप समाधान देता है।  


धैर्य में छिपा है वह प्रकाश

जो दिखाता अँधेरे में मार्ग

आत्मा की थकान धुल जाती

जब बहती है सहनशीलता भक्ति के साथ...

----  संध्या शर्मा ----


शुक्रवार, 21 मार्च 2025

अमर काव्य, जीवन आधार... संध्या शर्मा

कविता, शब्दों का जादू,  

भावनाओं की सरिता,  

इसकी हर पंक्ति में छुपा है,  

संसार, अद्भुत, अनोखा।  


कभी खुशियों के रंग बिखेरे,  

कभी गम की छाया ले आए,  

कविता तो मन का आईना है,  

जो दिल की बात कह जाए।  


कभी तुकों में बंध बनती,

लय, छंदों में बहता संगीत,  

ये तो आत्मा की भाषा है,  

जो हर पल रचे नया गीत।  


कलम से उतरती है ,  

दिल की गहराई में जन्मती,  

कविता तो अमर है,  

हर युग में जीवंत रहती।  


शब्द ब्रह्म अक्षर अनंत,  

कविता है सृष्टि का सार,

हर पंक्ति में ब्रह्मांड बसा,

अमर काव्य जीवन आधार।  





बुधवार, 5 जून 2024

हरियाली खुशहाली है... संध्या शर्मा

बच्चों आओ मैं हूँ पेड़

मुझे लगाओ करो ना देर

जब तुम मुझे उगाओगे 

धरती सुखी बनाओगे

दुनिया मेरी निराली है

हरियाली खुशहाली है


रोको मुझपर होते प्रहार

मैं हूँ जीवन का आधार

छाँव फूल फल देता हूँ

तुमसे कुछ नही लेता हूँ

वायू जहरीली पीता हूँ

शुद्ध हवा तुम्हें देता हूँ


प्रकृति का सम्मान करो

वसुंधरा का तुम ध्यान धरो

मेरा मन भी बहुत रोता है

दुख मुझको भी होता है

अब तो मुझको ना काटो

टुकड़ों टुकड़ों में ना बांटो 


मुझसे ही बनते हैं उपवन

मैं हूँ, तो जीवित हैं ये वन

देता हूँ पंछी को ठिकाना

और चिड़ियों को दाना

रूठी प्रकृति को मनाना

कहते थे ये दादा नाना

बात उनकी तुम मानोगे

घर - घर पेड़ लगाओगे

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

मेरी मां सबसे प्यारी-संध्या शर्मा


हम तीन बहनों और एक भाई की मां। बहुत प्यारी, बहुत कुशाग्र बुद्धि वाली थी। मां ने राजनीति, समाज और गृहस्थी हर जगह अपनी कुशलता दिखाई। आज भी जबलपुर में 'इंद्रावती शर्मा' सिर्फ़ नाम ही काफी है उनकी कीर्ति को जानने के लिए।

हम बच्चों के पालन पोषण से लेकर शिक्षा, व्यवसाय, शादी विवाह हर फैसले उन्ही के होते थे, जो आज भी उनकी सफलता के प्रमाण हैं।

मां ने अपनी बेटियों ही नही बल्कि अनेक अनाथ बेटियों के विवाह अपने दम पर किए और आजन्म उनकी भी मां का फ़र्ज़ निभाती रही।

मां ने बेटियों पर शोषण के विरोध में समाज के सामने आकर आवाज़ उठाई और उन्हे उनका हक़ दिलाया।


उन्होंने बचपन में किस्से कहानियों के माध्यम से नैतिक शिक्षा दी हमे। चंदामामा, पराग, पंचतंत्र की कहानियां जैसी पुस्तकें हमारे लिए पढ़ना उनकी आज्ञा होती थी। रामायण की चौपाइयों से अंताक्षरी खेलती थी। काग चेष्टा, बकुल ध्यान, स्वान निद्रा जैसी सीख आज भी याद है। टंग ट्विस्टर सिखाती। ताश के खेल जिसमें ट्वेंटी नाइन उनका प्रिय खेल था! उनके जाने के बाद कभी नहीं खेल सके हम।


एक बार का किस्सा याद आता है। हम छोटे ही थे तब। पड़ौस की एक बहु के पैर में फ्रेक्चर के बाद प्लास्टर था, पैसे की कमी और परिवार की अनदेखी में वह उस प्लास्टर को समय सीमा के बाद भी मज़बूरी वश ढो रही थी! एक दिन वह मां के पास आई। मां ने उन्हें अस्पताल चलने को कहा तो उन्होंने कोई परेशानी बताई। मां ने अपने हाथों से प्लास्टर काट कर उन्हे उससे निजात दिलाई और कुछ दिनों बाद उन्हें ले जाकर डॉक्टर को दिखाया भी।


हर परेशानी का हल चुटकियों में करने वाली मां की दोनों किडनी खराब हो गई थी। बहुत तकलीफ़ उठाई उन्होंने। जब बीमारी का कोई इलाज़ ना हो तो इंसान इधर उधर किसी अन्य पैथी या चमत्कार के पीछे भागता है।

इसी के तहत एक बार किसी ने कहा कि कुछ ' उतारा' जैसा होता है, उसे करके चौराहे पर डाल दो। लेकिन अंधविश्वास को न मानने वाली मां ने सीधे सादे शब्दों में कहा था "मुझे ईश्वर ने जो कष्ट दिए हैं , मैं उसे उनकी इच्छा समझकर भुगतने को तैयार हूं, और मैं कभी भी नही चाहूंगी कि किसी दुश्मन को भी मेरे बदले ये कष्ट हो"


एक बार की बात है मां अर्धचेतना की अवस्था में डायलिसिस के लिए हॉस्पिटल में भर्ती थी। रात के लगभग दो बजे डॉक्टर ने उन्हें बॉल दबाकर उंगलियों की एक्सरसाइज करने कहा। हम सब परेशान थे कि इतनी रात को बॉल कहां से मिलेगी। घर भी काफ़ी दूर था। तभी मां ने धीरे से आंख खोली और भाई को पास बुलाकर धीरे से कहा बेटा! परेशान मत हो! रुई का गोला बना और पट्टियों को लपेटकर बॉल बना दे।" इतनी तकलीफ़ में भी अपने बच्चों की तकलीफ़ नही देख सकती थी वो मां।

अपने अंतिम समय में जब भी हम सब उनके लिए कोई उपाय करने में लगते वो कहती "गोइंठा में कितना भी घी डालोगे वो सूख जाएगा। मत डालो!" क्योंकि उन्हें समझ रहा था उनका इलाज़ करवाना आसान नहीं है।


capd करवाया गया था उनका। साधारण डायलिसिस उनका शरीर झेल नही पा रहा था। सारी सावधानियों के बाद भी उन्हें इन्फेक्शन हो गया। बहुत कोशिश की गई। 

मैं नागपुर में ही थी। मां ने अंतिम बार मुझसे फोन पर बात की! मुझे उनकी आवाज़ में इतना दर्द महसूस हुआ कि मैने उस समय ईश्वर से प्रार्थना की "हे ईश्वर मां को अपने पास बुला ले। हमारे लिए इतनी तकलीफ़ में मत जीने दे उसे। मत रोने दे उसे दर्द सह सहकर! अब मां नही हम रो लेंगे!"

और इस तरह मैं अंतिम बार उनके वो शब्द"बेटा तू आ जा मेरे पास" भी नही सुन पाई! 

ईश्वर भी जैसे बस हमारे कहने की राह देख रहा था। सिर्फ़ पचास की छोटी सी उम्र में मां ईश्वर के पास चली गई।


मां की हर सीख याद है मुझे। हर समस्या का हल उन्हे, उनकी बातों को याद करते हल करती हूं। हर पल उन्हे महसूस करती हूं। अब तो आईने में भी माथे पर पड़ती लकीरों में वो दिखाई देने लगी है ।

सब कहते हैं मैं मां सी हूं। बहुत कोशिश करती हूं, कि मां जैसी बनूं। लेकिन नही बन सकती मैं उसके जैसी मैने कहा न "मेरी मां सबसे प्यारी"


संध्या शर्मा

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

अकती पूजन कैसे जाऊँ री, बरा तरें ठाडे लिवौआ...

हिंदू धर्म में प्रकृति के सभी तत्वों की पूजा, प्रार्थना का प्रचलन और महत्व है, क्योंकि हिंदू धर्म मानता हैं कि प्रकृति से ही हमारा जीवन संचालित होता है। इसीलिए प्रकृति को देवता, भगवान और पितृदेव माना गया है। हिन्दू संस्कृति के अधिकतर तीज त्योहार और पर्व परंपराएं प्रकृति से ही जुड़ी हुई हैं। ऐसा ही एक त्यौहार है "अक्षय तृतीया"

अक्ति, अकती, अक्षय तृतीया, आखा तीज ...अनेक नामों से जाना जाने वाला यह त्यौहार बुंदेलखंड में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।  बैशाख मास के शुक्ल पक्ष में तीज के दिन का यह पर्व कुंवारी कन्याओं एवं विवाहित महिलाओं के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस पर्व को कृषक भी बड़े उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाते हैं। सबसे पहले चार कलशों में पानी भरकर, पूरे गए चौक पर रखा जाता है। इन घड़ों पर वर्षा के चार माहों- क्रमशः असाढ़, सावन, भादों तथा कुंआर के नाम लिखे जाते हैं। इन घड़ों पर अमियाँ (कच्चे आम) और रोटियाँ रखी जातीं हैं तथा प्रत्येक घड़े में चनों के दाने डाल दिए जाते हैं।

तत्पश्चात पूजा-होम आदि करके प्रतीक्षा की जाती है। दूसरे दिन जिस घड़े के चने फूल जाते हैं, उस घड़े पर अंकित मास में ही वर्षा होगी, ऐसा अनुमान व विश्वास किसानों में होता है। इस तरह ही इस त्यौहार से कृषि-वर्ष का आरम्भ माना जाता है। गाँव का मुखिया ’बसोरों’ से बाजा बजवाता हुआ किसानों के साथ खेत पर नया ’बखर’ लेकर जाता है। पंडित या पुजारी उस बखर की पाँस पर गोबर और हल्दी लगाकर पूजन करता है। 


इसके बाद खरीफ फसल के अन्नों- ज्वार, उड़द, मूँग, तिल, मक्का आदि के दाने और सवा रुपया बखर पर रखकर मुखिया/जमींदार पूजन करता है। रुपये, दाने और मिट्टी को अपने हाथ से उठाता है और उन दानों को खेत में बोकर हल/बखर चलवा देता है। ऐसे ही अन्य किसान भी अपने-अपने खेतों पर जाकर करते हैं। अंत में सभी लोग मुखिया या जमींदार के घर जाते हैं, जहाँ उन्हें पान और स्त्रियों को घुघरी (उबले हुए गेहूँ तथा चने) दी जाती है। 

कन्यायें और स्त्रियाँ संध्या होते ही ’अकती’ के गीत गाते हुए किसी सरोवर या नदी पर जाती हैं और सोन (भीगी हुई चना दाल) वितरित करतीं हैं। कन्यायें पुतला पुतलियाँ सजातीं हैं। वट वृक्ष के नीचे उनका विवाह और पूजा करतीं हैं। स्त्रियाँ परस्पर हास्य-विनोद करती हुई, अपने-अपने पतियों के नाम जोड़कर इस प्रकार हंसी ठिठौली करती हैं-


’टाठी भरो घिऊ, हमाओ और ........ को एकई जिऊ।’


इसी प्रकार नवविवाहित किशोरियाँ भी ’दिनरियाँ’ या ’दुलरियाँ’ इन शब्दों में गाती हैं-


’अकती खेलन कैसे जाऊँ री,


बरा तरें ठाडे लिवौआ।


मेले री मेले मोरी सकियन के मेले।


ससुरा के संग न जाऊँ री,


बर तरें ठाडे लिवौआ।’


अक्ति के लान कैसे जाऊँ री , 


जे राजा रो रये हिलकिया 


रो रये हिलकिया


लाल करें अँखियाँ …. 


बेटियों के लिए यह त्यौहार आजन्म अपने बचपन की मीठी यादों की पोटली समान होता है। यह त्यौहार आते ही कल्पनाओं में चलचित्र की भांति विचरने लगते हैं वो प्यारे - प्यारे गुड्डे - गुड़ियाँ, जिनका ब्याह रचाने की तैयारियों में न जाने कब बीत जाता है सखियों संग हंसी - ठिठौली करते वो सुनहरा सा बचपन... 


विवाह गुड्डे गुड़िया का होता है परन्तु घर में उत्साह विवाह जैसा ही होता है। गुड्डा-गुड़िया के विवाह से बच्चों को गृहस्थी की सीख मिलती है कि आने वाले समय में वे कुशल माता-पिता बनकर अपनी संतति, परिवार एवं समाज व देश के प्रति अपने दायित्यों का निर्वहन सफ़लता से करें। एक तरह से यह समाज के लिए उत्तम नागरिक बनाने की प्रक्रिया है।


शहरों में तो मिट्टी का घड़ा कभी भी खरीद कर लोग पानी पीना शुरु कर देते हैं, परन्तु ग्रामीण अंचल में यह परम्परा आज भी जीवित है कि अक्ति के दिन से नये घड़े का जल पीना प्रारंभ किया जाता है।


"पीहर' याद आता है 

माँ' याद आती है  

अक्ती की पुतरियाँ 

इशारों से बुलाती हैं

"आज भी जब नए घड़े के पानी से 

सोंधी-सोंधी खुश्बु आती है ..."


अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्‍णु के छठें अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम का जन्‍म हुआ था। परशुराम ने महर्षि जमदाग्नि और माता रेनुकादेवी के घर जन्‍म लिया था। यही कारण है कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्‍णु की उपासना की जाती है। इस दिन परशुरामजी की पूजा करने का भी विधान है।

अक्षय तृतीया के दिन ही पांडव पुत्र युधिष्ठर को अक्षय पात्र की प्राप्ति भी हुई थी। इसकी विशेषता यह थी कि इसमें कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था।

अक्षय तृतीया के अवसर पर ही म‍हर्षि वेदव्‍यास जी ने महाभारत लिखना शुरू किया था। महाभारत को पांचवें वेद के रूप में माना जाता है। इसी में श्रीमद्भागवत गीता भी समाहित है।


अक्ति का त्यौहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस दिन पितरों का पिंड दान किया जाता है। जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कुल में मिलाने का कार्य भी इसी दिन होता है। इस दिन पितर कुल में मिले हुए को आगामी पितृपक्ष में पिंड दान दिया जाता है, अन्य पितरों के साथ उसका भी तर्पण किया जाता है।


मान्यता हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है।

इस तरह समस्त अंचल में अक्ति (अक्ष्य तृतीया) धूम धाम से मनाया जाता है।


भले ही हम आधुनिक युग के भौतिक प्रपंचों में उलझकर परम्पराओं से विरक्त हो रहे हैं, परन्तु इन परम्पराओं का निर्वहन हमें अपनी माटी से जोड़ता है। अपनी संस्कृति से, अपने पुरखों से जोड़ता है, अपने इतिहास एवं समाज से जोड़ता है। इसलिए हमें अपने परम्परागत त्यौहारों को कभी नहीं भूलना चाहिए। 


शनिवार, 4 जून 2022

क़वायद .... ! - संध्या शर्मा

 

जब बारिश आती है 

शुरू हो जाती है

क़वायद  .... !

एक तरफ धरती की

दूसरी ओर इंसान की

धरा ढूंढती है कॉन्क्रीट के बीच

जल को आत्मसात करने की जगहें

और इंसान तलाशता है

पानी से बचने का ठौर

__संध्या शर्मा__

सोमवार, 23 अगस्त 2021

कजलियां-छोटन ने दई, बड़न ने लई, बारन के कानन में खोंस दई

कजलियां प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा पर्व है। इसका प्रचलन सदियों से चला आ रहा है। राखी पर्व के दूसरे दिन कजलियां पर्व मनाया जाता है। इसे कई स्थानों पर भुजलिया या भुजरियां नाम से भी जाना जाता है। श्रावण मास की अष्टमी और नवमीं तिथि को बांस की छोटी-छोटी टोकरियों में खेतों से लाई मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं के दाने बोए जाते हैं।

 गेहूं की फसल बोने से पहले मनाए जाने वाले इस पर्व पर मिट्टी की उर्वरक शक्ति तथा बीजों की अंकुरण क्षमता परखी जाती है। अलग-अलग खेतों से लाई गई मिट्टी में घर में रखे गेहूं के बीज को बोया जाता है।

इससे जब कजलियां तैयार होती है तो किसानों की इस बात का अंदाजा लग जाता है कि खेत की मिट्टी और गेहूं का बीज कैसा है। यदि कजलिया मानक के अनरुप पाई गई तो किसान आश्वस्त हो जाते हैं कि बीज और खेत की मिट्टी गेहूं की फसल के लिए उपयुक्त है।

यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। तकरीबन एक सप्ताह में गेहूं के पौधे उग आते हैं, जिन्हें भुजरिया कहा जाता है। 

श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। कजलियों (भुजरियां) के दिन महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए और गाजे-बाजे के साथ तट या सरोवरों में कजलियां विसर्जन के लिए ले जाती हैं।

तालाबों और तटों पर कजलियां खोंट ली जाती हैं और बची टोकरियों का विसर्जन कर कजलियां पर्व मनाया जाता  है।

हरी-पीली व कोमल गेहूं की बालियों को आदर और सम्मान के साथ भेंट करने एवं कानों में लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। 

तालाबों व तटों पर कजलियां विसर्जन का मेला लगता है। 

चारों ओर खरीददारी के लिए दुकानें सजती हैं।

सभी एक दूसरे की सुख - समृद्घि की कामना कर पुराने राग - बैर को भूलने का संकल्प करते हैं।

मेल मिलाप के इस पर्व पर लोग एक दूसरे को कजलियों का आदान प्रदान करते  हैं। जो बराबरी के हैं, वे गले लगते हैं और जो बड़े हैं वे छोटों को आशीर्वाद देते हैं। बच्चों के कान में स्नेह और आशीष स्वरुप कजलियां खोंस दी जाती है। 

कजलियों को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने मिलता है। बच्चों को कजलियां देने के बाद शगुन के रूप में बड़े उन्हें उपहार देते हैं। लोग सुख - दुख बांटने, मेल-मिलाप के लिए नाते-रिश्तेदार एक दूसरे के घर जाते  हैं।

 
मान्यतानुसार इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय से है। 
 
इस पर्व की प्रचलित जानकारी के अनुसार आल्हा की बहन चंदा श्रावण माह में ससुराल से मायके आई तो सारे नगरवासियों ने कजलियों से उनका स्वागत किया था। महोबा के सिंह सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान की वीरगाथाएं आज भी बुंदेलखंड में गाई जाती है।

कहते है कि महोबा के राजा परमाल की बेटी राजकुमारी चन्द्रावलि का अपहरण करने के लिए दिल्ली के राजा पृथ्वीराज ने महोबा पर चढ़ाई कर दी थी।
 
उस समय राजकुमारी तालाब में कजली सिराने अपनी सखियों के साथ गई हुई थी। राजकुमारी को पृथ्वीराज से बचाने के लिए राज्य के वीर महोबा के वीर सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान ने वीरतापूर्ण पराक्रम दिखाया था।  इन दो वीरों के साथ में चन्द्रावलि के ममेरे भाई अभई भी उरई से जा पहुंचें। कीरत सागर ताल के पास हुई लड़ाई में अभई को वीरगति प्राप्त हुई। उसमें राजा परमाल का बेटा रंजीत भी शहीद हो गया।
 
बाद में आल्हा-ऊदल, और राजा परमाल के पुत्र ने बड़ी वीरता से पृथ्वीराज की सेना को हराया और वहां से भागने पर मजबूर कर भगा दिया। महोबे की जीत के बाद पूरे बुन्देलखंड में कजलियां का त्योहार मनाया जाने लगा।  

छोटन ने दई,    बड़न ने लई
बारन के कानन में खोंस दई

कजलियां महापर्व की हार्दिक - हार्दिक मंगलकामनाएं

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

जल्दी आना ओ चाँद गगन के .....



करवा चौथ

मैं यह व्रत करती हूँ
अपनी ख़ुशी से
बिना किसी पूर्वाग्रह के
करती हूँ अपनी इच्छा से
अन्न जल त्याग
क्योंकि मेरे लिए
यह रिश्ता ....
इनसे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है
मेरे लिए यह उत्सव जीवन में
उस अहसास की ख़ुशी व्यक्त करता है
कि उस ख़ास व्यक्ति के लिए
मैं भी उतनी ही ख़ास हूँ
मैं उल्लसित होकर सजती संवरती हूँ
मेरे लिए मेहँदी , सिन्दूर ,चूड़ियाँ, महावर
संस्कारों और संस्कृति का हिस्सा हैं
सबसे अनमोल गहने हैं  
दीप अक्षत रोली हल्दी कुंकुम की थाल सजाकर
भागदौड़ के जीवन से कुछ पल चुराकर
चाँद - तारों और खुले आसमान के साथ
प्रकृति के बहुत क़रीब होती हूँ
चाँद की प्रतीक्षा करती हूँ
भावविभोर होकर महसूस करती हूँ  
चाँद का धरती के प्रति तन्मयता से
निभाया जाने वाला
सदियों का प्यार और समर्पण
और धन्य हो जाती हूँ
उस चाँद की उपमा पाकर  ...... 

शनिवार, 31 अगस्त 2019

मेरी नज़्म... संध्या शर्मा

 ख़यालों के पंख लगाकर
ख़्वाबों की उड़ान भरकर
कितनी भी दूर क्यों न चली जाए
लेकिन लौट आती है "मेरी नज़्म"
उतर आती है ज़मी पर
मेरे साथ नंगे पाँव घूमती है
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल, बूटा -बूटा
इसलिए तो तरोताज़ा रहती है
जब कभी यादों के सात समंदर पार करके
थककर निढाल हो जाती है
तो बैठ जाती हैं मेरे साथ
साहिल की ठंडी रेत पर
जाने क्या लिखती - मिटाती
बड़ी शिद्द्त और ख़ामोशी से
देखती रहती है.....
ख्वाहिशों की तरह
लहरों का आना
और पत्थरों से चोट खाकर
बार-बार लौट जाना...

सोमवार, 19 अगस्त 2019

कौना सी गुइयाँ सासरें, माई सावन आये

नव पल्लव झूम उठते हैं , डालियाँ बल खाने लगती हैं। दादुर , मोर , पपीहे सरगम छेड़ने लगते हैं तो लोकजीवन भला कैसे पीछे रह जाये।  क्यों न वह भी झूमे-नाचे और गाये। इसी मनभावन सावन के मौसम में मल्हार और झूलों के पींगों से रंग जाता है जन जीवन। निभाई जाती हैं परम्पराएँ।  छिड़ जाते हैं आल्हा के राग, कजरियाँ के गीत और गाने लगता है पूरा का पूरा बुंदेलखंड।  

सावनी बुंदेलखंडी परम्परा-
बुंदेलखंडी जीवन शैली प्रकृति के हर रूप - रंग से जुडी अनोखी जीवन शैली है । यहाँ हर त्यौहार , प्रकृति और लोक रंजन से जुड़ा होता है । सावन की कई परम्पराएं हैं जो  लोकजीवन के प्रकृति प्रेम, आपसी समन्वय और प्रेम को दर्शाती हैं। 

महिलाऐं और बालिकाएं मेहँदी के पेड़ से मेहँदी की पत्तियां तोड़ कर लाती हैं, उसे पीस कर एक -दूसरे की हथेली पर लगाती हैं, लोक मान्यता है कि जिस कन्या के हाथ में जितनी गहरी मेहँदी रचेगी उसे उतना ही सुन्दर पति मिलेगा। उन ताज़ी मेहंदी की पत्तियों से रची मेहंदी का रंग भी इतना सुन्दर होता था जिसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता और खुश्बू की तो बात ही अलग है। गाँव -मोहल्ले  में बच्चे चकरी , भौरा (लट्टू) चलाते, तो कोई बांसुरी की धुन छेड़ते और बालिकाएँ लाख के रंगबिरंगे या फिर पीले कनेर के फल से बने चपेटों से खेलते मिल जाती हैं।   
           लोक जीवन की इन परम्पराओं की समाप्ति के पीछे  का जो मुख्य कारण है वह आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में हम सब प्रकृति से अलग हो गए हैं । गाँव के घरो में लगे पेड़ कट गए , गाँव में लगे कुछेक वृक्ष किसी ना किसी की बपौती हो गए , उस पर उनके घर के लोगों के अलावा दूसरा  कोई जा नहीं सकता । इस तरह से झूला की परम्परा समाप्त हो गई । लट्टू और चकरी पहले गाँव का बढ़ई बना दिया करता था फिर बाजार में मिलने लगे अब वे भी नहीं मिलते । बांसुरी की तान बांस से बनी बांसुरी से ही आ सकती है , उसका स्थान प्लास्टिक ने ले लिया है। चपेटा जरूर खेला जाता है पर बहुत कम क्योंकि लोगों को अब टीवी से ही फुर्सत नहीं मिलती 

सावन के झूले -
वर्षा ऋतू  में जब चहुँ ओर हरियाली ही हरियाली हो तो ऐसा कोई नहीं जिसका मन प्रफुल्लित ना होगा। इस सावन की ऋतू में बुंदेलखंड के घर - घर में ऊँचे वृक्ष की डाल पर झूले डाले जाते थे ।  धीरे - धीरे ये झूले गाँव तक सिमट गए । अब किसी गांव में ही ये झूले और झूलों पर झूलती बालाएं देखने को मिल सकती हैं | सावन का महीना उल्लास और उमंग का महीना झूलों पर पेंग बढ़ाती नवयुवतियों के गीतों से झूम उठता -

झूला झूलन चलो ब्रजराज, बागान झूला डरे। 
कोयल डारन - डारन डोलत, मोर पपीहा पग-पग बोलत,
बहुत शीतल है जमुना की धार, बागन झूला डरे...... 
कहीं कुमारी और नवविवाहित युवतियाँ सुरीले कंठों से गा उठती हैं - 
एक चना दो देवली, माई, सावन आये। 
सावन के दिन चार रये, माई सावन आये?

अर्थात एक चने के दो टुकड़े जिन्हे देवली कहते हैं , उसी तरह भाई-बहन भी एक ही माता -पिता की संतान हैं, लेकिन दोनों की राहें अलग-अलग। एक माता-पिता के साथ है तो दूसरी ससुराल में।  परन्तु हमारा स्नेह शाश्वत है। अलग-अलग घर हो जाने पर भी हमारे मन एक हैं। सावन में भाई-बहन साथ रहेंगे। अब तो सावन के केवल कुछ ही दिन शेष रह गये हैं। 

कौना सी गुइयाँ सासरें, माई सावन आये,
'रूपा' सी गुइयाँ  सासरे, माई सावन आये। 
गीत में ही पूछती हैं कौन सी सहेलियाँ अभी तक ससुराल में हैं? सावन तो आ गया है।  आमतौर पर सभी विवाहित लड़कियों को ससुराल से मायके बुला लिया जाता है। इसलिए इन सहेलियों को सावन का झूला झूलते समय अपनी सभी सहेलियों की याद आती है, और आपस में पूछा जाता है कि कौन -कौन अब भी ससुराल में हैं।  उत्तर मिलता है कि रूपा सहेली अभी तक ससुराल में ही है। इसी तरह 'रूपा ' के स्थान पर, गाने वाली सहेलियाँ अपनी अन्य ऐसी सहेलियों के नाम जोड़ती जाती हैं जो उस समय तक मायके नहीं आ जाती।  

ऊँचे अटा  चढ़ हेरे बैना, मोरे भैया लिबऊआ आये। 
माई खों बिटिया बिसर गईं, बाबुल की गई सुध भूल। 
उपरोक्त लोकगीत की पंक्तियों में उस विवाहिता लड़की का चित्रण किया गया है जिसका भाई सावन निकट आने पर भी उसे लिबने नहीं पहुँच सका। उस नवविवाहिता के मन में इस कारण यह भावनाएं हिलोरें मार रही हैं -" ऊँची छत पर चढ़कर बहिन राह निहार रही है कि कब उसके भाई उसे लेने आ रहे हैं। माता शायद बेटी को भूल ही गई हैं और पिताजी को उसकी याद ही नहीं रही।"

जाय जो कैयो उन बैन के जेठ सें, तुमरे सारे छिके पैले पार। 
छिके - छिके  उनै रैन दो , उन सारे खों दियो लौटाय।   
भाई कहते हैं कि बहन के जेठ से जाकर कह दो कि तुम्हारे साले नदी के उस पार फंसे हुए हैं।  सावन का महीना है नदी में बाढ़ है बेचारा भाई बहन के घर कैसे आ पाता। लेकिन साले - बहनोई का मजाक भी जगजाहिर है। बहन के जेठ मजाक में कह देते हैं - साले जी छिक गए हैं तो उन्हें छिका  ही रहने दो। उन्हें वापस जाने दो। 

जाय  जो कइयो उन हमरे राजा से, अपने सारे कौन डेरा दिवाउ। 
सारण जौ बाँधो उड़न - बछेरा, घुल्लन टाँगो तरवार
बहन कहती है कि मेरे साजन से जाकर कह दो कि अपने सालों के ठहरने को यथास्थान व्यवस्था करवा दें।  घुड़साल में मेरे भैया का घोडा बँधवा दें और खूँटियों पर उनकी तलवार टँगवा दें। 

सुनो मेरी सासो, वीरन आये,
उनै कहा रचौं जेवनार ?    

भाई के ठहरने की उचित व्यवस्था हो जाने के बाद वह अपनी सास के पास जाकर उनसे पूछती है  कि मेरे भाई आ गए हैं। उनके लिए भोजन में क्या - क्या बनाऊँ ?

कजरियाँ (भुजरियां) 
सावन की समाप्ति के लगभव एक सप्ताह पूर्व बुंदेलखंड में कजरियाँ (भुजरियाँ ) बोई जाती हैं। गेहूं के दानो को पानी में भिगोकर छोटी-छोटी बांस की टोकनियों में मिट्टी और गोबर की खाद डालकर बोई जाती हैं, फिर इन्हें कजरियों तक ढंककर रखते हैं। कहा जाता है कि जितनी अच्छी बढ़त इन कजरियों की होती है उस वर्ष उतनी ही अच्छी अन्न की फसल होती है।
सावन पूर्णिमा के दूसरे दिन इन कजरियों को गाते बजाते बड़े ही धूमधाम से नदी या तालाब में प्रवाहित किया जाता है , तथा कुछ कजरियाँ बचाकर रख ली जाती है।  जिन्हे आपस में आदान प्रदान कर बड़े छोटों के कानो में खोंसकर आशीर्वाद देते हैं और छोटे बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं। 

कजरियाँ के इस उत्सव में नर-नारी समान रूप से सम्मिलित होते हैं और अभिनय के साथ अनेक लोकगीत गाते हैं। नारियों का एक दल एक तरफ से गाता है -
साउन कजरियाँ जबई जे बैहें। 
अपनी बहन कौन ल्याव लिवाय। 
सावन में कजरियाँ तभी बोई जाएँगी , जब तुम अपनी बहिन को ससुराल से लिवा लाओगे।  नारी वात्सल्य की भावना का अत्यंत मार्मिक चित्रण है इस लोकगीत में। माँ चाहती है कि उसकी बेटी सावन में ससुराल से मायके आ जाये और इस उत्सव में सम्मिलित हो। 
यह सुनकर दूसरी ओर से पुरुषों का दल गा उठता है :
गऊवां पिसाव माई करो कलेवा ,
अपनी बहिन लिवावे जायँ। 
कहाँ बँधे मोरे उड़न बछेरा,
कहाँ टँगी तरवार ?  

सन् 1182 ई. का सावन अपनी सारी रंगीनी और चहल-पहल के साथ आया था। उसे मालूम था कि चंदेलों की राजधानी महोबा में उसकी जितनी अगवानी होती है, उतनी और कहीं नहीं। इसीलिए कारी बदरिया, रिमझिम मेह, दमकन् बिजुरी, सजी-धजी हरयारी, रचनू मेंहदी, नचत-बोलत मोर-पपीरा और तीज-त्यौहार-सब अपने-अपने करतब दिखाने लगे थे। अलमस्त पहाड़ और अलगरजी ताल दुर्ग की तरफ आँखें गड़ाये खड़े थे। शायद सावन की सौगातों की ललक से अलमस्त थे सभी। 
लेकिन अचानक इतनी ख़ामोशी छा गई। यहाँ तक कि दुर्ग की प्राचीरें चुपचाप खड़ी हुई। दिल्लीनरेश पृथ्वीराज चौहान ने महोबा का घेरा डाल दिया ! उसने चन्द्रावलि, महाराज परमर्दिदेव की राजकुमारी का डोला माँगा लिया। कविराज जगनिक आल्हा-ऊदल को लिवाने कन्नौज गए थे, पर अभी तक नहीं लौटे। महारानी माल्हनदे ने पत की पगिया सौंपने भेजा था उन्हें।
"पाग तक राजमाता के चरणों में रखने दे दी है चन्द्रा, फिर भी आल्हा-ऊदल नहीं आएँगे ? तू क्यों रोती है ? " माल्हनदे चन्द्रावलि को समझा नही थी और राजकुमारी बिलख-बिलखकर रो रही थी-"कजरियों के दौने मुरझा चले हैं माँ, राखी उदास पड़ी है। दिन चला गया, रात भी खिसक रही है... कब तक देखोगी ऊदल को....? " और ब्राहृजित ने आकर रोष में कहा-"बहिन, क्यों हठ करती है ? इतना बड़ा मदन सागर पड़ा है, सोने की नादें दूधों से भरी हैं...इन्हीं में कजरियाँ खौंट लो...दुर्ग से उतरकर युद्ध लड़ना मौत को बुलाना है... " चन्द्रावलि गरज उठी-"भइया, मौत से डरते हो, तो बैठो चुपचाप...हम तो कजरियाँ कीर्ति सागर में ही खौंटेंगी...लड़ ले चौहान...चन्द्रावलि का डोला मौत का डोला है...मौत का...। "
और पौ फटते ही महोबा के दुर्ग से नौ सौ डोले उतरे। हर डोले में दो वीरांगनाएँ, तलवार और कटारी के साथ एक-एक विष की पुड़िया लिये हुए और कजरियों के लहलहाते दोनों की रखवाली में मौत से जूझने को तैयार। पीछे रेंगती चंदेली सेना। रथ, हाथी, घोड़े और पैदल। चौहानों ने धावा बोल दिया। घमासान युद्ध।कीर्ति सरोवर की पार पर डोले छिके रहे। चंदेल सेना पीछे हटी और चन्द्रावलि का डोंला आगे बढ़ा। माल्हनदे ने इशारे से रोका। कठिन परीक्षा की घड़ी। चन्द्रावलि डोले से उतरी कि जोगियों की एक सेना चौहानों पर टूट पड़ी। बाजी पलट गई।
ऊदल से मिलते-जुलते एक योद्धा जोगी ने चन्द्रावलि से कहा-"बहिना, खौंटो कजरियाँ... " डोलों से युवतियाँ उतर पड़ीं। लाल-लाल सारीं और चोलीं पहने इन्द्रवधूटीं-सी रेंगीं। ऊपर घहराते बादल और नीचे खनकती तलवारें। बीच-बीच में दहाड़ें और कराहों के डरावने स्वर। कैसा अजीब दृश्य। बड़ी-बड़ी अँखियों में कजरारी नजरों से इधर-उधर टोह-सी लेतीं और सिर पर रखी कजरियों को सम्हालतीं युवतियाँ कजरी गीत गा उठीं। सरोवर के किनारे-किनारे मिठास बिखेरती हुई सी।
सबसे आगे थी चन्द्रावलि। उसने जल में दोना रखा कि पृथ्वीराज चौहान ने आकर भाले की नोक से उसे उठाना चाहा, पर उस जोगी की झपटती तलवार ने उसे दो टुकड़े कर दिया। दोनों लड़ते-लड़ते दूर चले गए। आखिर चौहान हार गए और कजरियाँ खोंटकर चन्द्रावलि ने जोगी बनेऊ दल की पाग में खोंस दीं। राजमार्ग के दोनों तरफ योद्धा खड़े थे, बीच में कजरियाँ देती जा रही थी युवतियाँ और यथोचित प्रेम एवं सम्मान अर्पण कर रहे थे पति, भाई, देवर और जेठ।

यह थी बारहवीं शती की एक ऐतिहासिक घटना, जिसने कजरियों के उत्सव को एक नया मान दिया है और लोकगीतों में आमूल परिवर्तन किया है। पहले कजरियाँ फसल और समृद्धि से जुड़ी थीं, पर इस प्रसंग से संबद्ध होकर भाई-बहिन के प्रेम की प्रतीक बन गई। यहाँ तक कि प्रेम और सद्भाव इतना आम हो गया कि अब कजरियाँ सभी के लिए भाईचारे का संदेश लेकर आती हैं और होली के रंग तथा दशहरे के पान की तरह भारतीय संस्कृति की विरासत बन गई हैं।


सावनी भेजने की परम्परा :_
 सावन के महीने में  बुंदेलखंड में सावनी भेजने की परम्परा भी है।  यह अब समाप्त सी हो गई है, इसका स्थान अब पैसों ने ले लिया है।  इस परम्परा में विवाहित महिला पहली बार जब सावन के महीने में अपने मायके जाती है । तब उसके पति के घर से  उसके भाई के लिए सोने -चांदी की राखी , कपडे , लकड़ी के खेल खिलौने, उपहार आदि भेजे जाते हैं । ससुराल से आई राखी ही बहिन अपने भाई की कलाई पर बांधती है। इसका बाकायदा गाँव के लोगों को निमंत्रण दिया जाता था, पड़ौसी - रिश्तेदार  आकर सावनी में आये सामान को देखते थे। अब सावनी के सामान के स्थान पर पैसा भेज दिया जाता है ।  
परम्परायें आपसी सम्बन्ध को मजबूत करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं किन्तु आधुनिकता की होड़ में अब ये सिर्फ औपचारिकता बन कर रह गई हैं । 

बुधवार, 10 अगस्त 2016

रिमझिम के तराने लेकर आई बरसात …… संध्या शर्मा

नौतपा की झुलसाने वाली गर्मी के बाद जब वर्षा की पहली फ़ुहार भूमि पर पड़ती है तो झींगुर का मन नाच उठता है, दादुरों को पुन: जीवन मिल जाता है और वे कूद-कूद कर बारिश के जल वाले स्‍थान की खोज में निकल पड़ते हैं। धरती में सोए बीज अंगड़ाई लेने लगते हैं। चातक पंख फ़ड़फ़ड़ाने लगता है। मोर नाचने लगते हैं, गाय-गोरु, कीट-पतंगे भी हरियाने लगते हैं, सारी प्रकृति ही वर्षा के स्वागत में लग जाती है । कुछ दिनों में धरती हरियाली की चादर ओढ लेती है तो लगता है कि किसी ने सूखकर कांटा हो चुकी वसुधा पर अमृत की बूंदे छिड़क दी हो। 

यह मौसम हर किसी को झूमने पर मजबूर कर देता है। चारों ओर हरियाली, ठंडी-ठंडी पवन की मदमस्त बयार, बारिश की रिमझिम और सखियों का साथ। वर्षा का मौसम मेलों की परंपराओं को भी हरिया जाता है। वनखंड में सखियों के स्‍वर गूंजते हैं। भोजपुरी गीतों में वनों की रौनक का वर्णन मिलता है : 
कवना बने रहलू ए कोइलरी, कवना बने जासु। 
केकरा दुअरवा ए कोइलरि उछहल जासु।
नंदबने रहलू एक कोइलरि बृंदाबन जासु।

जब किसान कांधे पर हल लेकर निकलता है, तो वह शुभ दिन होता है, क्योंकि यही वह समय होता है जब मनुष्य के भविष्य के लिए अनाज उपजाने का कार्य करता है। धरती आर्द्र और आर्द्रा ही बुवाई का नक्षत्र, भोजपुरी किसानों को यह सब याद है : 

खेतवा जा ला रे किसनवा/हरवा जोते ला किसनवा 
नाचब गाईब पहिरब कंगनवा हो 
हंसिया लईके काटब धनवा 
लेकिन रहब तोहरे संगवा
ठीक दोपहरिया में लइबे जलपानवा 
खेतवा जा ला रे किसनवा...... 

आदरा धान पुनरबस पैया। 
गेल किसान जे बोये चिरैया। 
यह मौसम प्रियागमन का भी है। इसीलिए कहा जाता है कि यदि प्रिय के आने का समाचार मिला होता तो मैं बासमती चावल छंटवाकर रखती : 
जउ हम जनती पिया की अवइया। 
वासमती चउरा छंटाइ रखती। 

इस काल में देहात में जुताई-बुवाई की रंगत चलते ही 'समहुत' का वातावरण बन जाता है, घर-घर विशेष भोजन तैयार होते हैं। किसानों के लिए हल और बैल दोनों ही देव तुल्‍य होते हैं और बुवाई के साथ्‍ा ही कामनाओं के ज्‍वार उठने लगते हैं कि चारों कोने हरियाली से पूर्ण हों और सुहासित, सुवासित लगे : 
हरियर हरियर चारो कोनवा सहादेव।

वर्षा से पृथ्वी को जो जल मिलता है तो उससे समस्त जीव जंतुओं का निस्तार होता है और ग्रीष्म काल की गर्मी से छुटकारा प्राप्त होता है। खेतों में फसल बोई जाते हैं। पेड़-पौधों के उगने के लिए यह ऋतु सबसे श्रेष्ठ है । खेतों में काम करते हुए हलियारों के गीत कानों में गूंजने लगते हैं, ढेले फ़ोड़ती महिलाओं के सुमधुर कंठ का गान खेतों में महकाने लगता है - झूल तो पड़ गयो अमवा की डार मा, 
मोर-पपीहा बोले !" 

ऐसे कुछ बुंदेली गीत हैं, जो वर्षा के आते ही गली-कूचों और आम के बगीचों में गूंजने लगते हैं। मोर, पपीहा और कोयल की मधुर बोली के बीच युवतियां झूलों का लुत्फ उठाती हैं। सावन को वर्षा ॠतु का महत्वपूर्ण महीना माना जाता है, इसे तीज-त्यौहारों का महीना भी कहा जाता है, विशेषकर भोले बाबा की उपासना का माह भी होता है। 

नव विवाहितों के मायके आते ही झूले डाले जाते हैं, वैसे तो वर्तमान से सभी के घरों में बारहमासी झूला स्थापित होता है, किन्तु सावन में उपवन में लगे झूले के प्रति मन में विशेष उल्लास, उमंग, उत्कंठा होती है। वास्तव में झूला झूलना मात्र आनंद की अनुभूति नहीं कराता अपितु यह स्वास्थ्यवर्धक प्राचीन योग है जो सावन के मनोरम मौसम के कारण प्रदूषण मुक्त शुध्द वायु देता है।

बरसात होने से हवा में उड़ने वाले धूल, धुंए के कण, पानी में घुलनशील सभी हानिकारक गैसें भी वर्षा के जल के साथ-साथ धरती पर गिरकर भूमि में समा जाती हैं और शुध्द हवा स्वास्थ्य के लिए उत्तम होती है। सावन में चहुं ओर हरियाली छाई होती है। कहा गया है कि हरा रंग आंखों पर अनुकूल प्रभाव डालता है। इससे नेत्र ज्योति बढ़ती है। झूला झूलते समय नेत्र कभी खुलते और कभी बंद होते रहते हैं। इस सह उपक्रम के कारण सावन में झूले के माध्यम से नेत्रों का सम्पूर्ण व्यायाम हो जाता है। जो नेत्रों के लिए अत्यंत हितकारी है। झूला झूलने से हमारे मन मस्तिष्क में हर्ष और उल्लास की वृध्दि होती है। इसके कारण ग्रीवा की नसों में पैदा होने वाला तनाव कम होता है जिससे स्मरण शक्ति तीव्र होती है। झूला झूलते समय श्वांस-उच्छवास लेने की गति में तीव्रता आती है।

वर्षा ऋतु में कवि मन बहुत प्रसन्न हो जाता है व वर्षा की धाराओं के साथ झूमने लगता है, रंग बिरंगे फूलों के साथ खिल उठता है, तितलियों से संग उड़ता है, भौरों के साथ गुनगुनाता हुआ प्रकृति के साथ हरियाला हो जाता है। और कह उठता है- 
"शोख़ हवाएं आज ज़रा - ज़रा नम हैं, काली घटा, बिजली बूंदों का संग है...।"

भगवान कृष्ण और राधा की रासभूमि पर सावन की बहार में स्वयं भगवान भी झूलने का मोह संवरण नहीं कर पाते। सावन के दिनों में ब्रज में रिमझिम-रिमझिम बरसात में भगवान राधा-कृष्ण को भी झूलों पर झुलाया जाता है। राधा कृष्ण के साथ हर मन बावरा होकर अपने प्रिय को पुकारते हुए गा उठता है- सावन के झूले पड़े, तुम चले आओ, तुम चले आओ.....।

शनिवार, 16 जुलाई 2016

बुंदेली लोकगीतों में जल का महत्व... संध्या शर्मा

पृथ्वी का अमृत जल को कहा गया है, अगर जल न हो तो यह वसुंधरा जल जाए। प्राणियों का अस्तित्व ही मिट जाए, इसलिए हमारे पूर्वजों ने जल का हमेशा सत्कार किया, उसकी महत्त्ता एवं उपयोगिता को समझ कर आने वाली पीढीयों को सचेत किया। है। जितने नाम जल के हैं, उससे अधिक उसका उपयोग है। आज बुंदेलखंड क्षेत्र जहाँ जल की कमी से जूझ रहा है वहीं प्राचीन काल में जल महत्व समझकर उसका गुणगाण किया जाता था और लोकगीतों के माध्यम से जन जागृति करने का कार्य भी किया है।  

मध्यप्रदेश की हृदयस्थली बुन्देलखण्ड को चेदि तथा दशार्ण भी कहा जाता है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में “चेद्य नैषधयोः पूर्वे विन्ध्यक्षेत्राच्य पश्चिमे रेवाय मुनयोर्मध्मे युद्ध देश इतीर्यते।” यह श्लोक वर्णित है। दशार्ण अर्थात दश जल वाला या दश दुर्ग भूमि वाला द्धण शब्द दुर्ग भूमौजले च इति यादवः जिस प्रकार पंजाब का नाम पांच नदियों के कारण पड़ा मालूम होता है, उसी प्रकार बुन्देलखण्ड का दशार्ण नाम – धसान, पार्वती, सिन्ध (काली) बेतवा, चम्बल, यमुना, नर्मदा, केन, टौंस और जामनेर इन दस नदियों के कारण संभव हुआ है।


बुन्देली धरा को प्रकृति ने उदारतापूर्वक अनोखी छटा प्रदान की है। यहाँ पग-पग पर कहीं सुन्दर सघन वन और कहीं शस्यश्यामला भूमि दृष्टिगोचर होती है। विन्ध्य की पर्वत श्रेणियाँ यत्र-तत्र अपना सिर ऊँचा किए खड़ी हैं। यमुना, बेतवा, धमान ,केन, नर्मदा आदि कल-कल नादिनी सरितायें उसके भू-भाग को सदा सींचती रहती हैं। शीतल जल से भरे हुए अनेकों सरोवर प्रकृति के सौन्दर्य को सहस्त्रगुणा बढ़ाते हैं। अर्थात यहाँ प्रकृति अपने सहज सुन्दर रूप में अवतरित हुई है। यहाँ की सरिताएं विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पर्वत श्रेणियों में जन्मी हैं। कभी चट्टानों में अठखेलियाँ करतीं, कभी घने वनों में आच्छादित इलाकों में विचरण करती हैं और कभी मैदानी भागों से बहती ये नदियाँ आगे बढ़ती हैं।

जल में प्राणदायिनी शक्ति छिपी है, मानव शरीर पाँच तत्वों से मेल से बना है, जिसमे जल का महत्वपूर्ण स्थान है। ताजा जल हमें केवल एक ही स्रोत से मिलता है, वह है वर्षा। झीलें, हिमनद, नदियां, चश्में, कुएँ जल के गौण साधन हैं, और इन्हें भी वर्षा या बर्फ से जल मिलता है। इन साधनों के माध्यम से वर्षा का पानी इकट्ठा हो जाता है। जब वर्षा होती है, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे अमृत बरस रहा हो और ताप से व्याकुल वसुंधरा हरियाली चूनर ओढ़कर नवयौवना जैसी सज संवर जाती है।

जल को अमृत माना जाता हैl मनुष्य की दैनिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु जल की खपत होती है। अर्थात जल ही जीवन है। हमारे लोक कवियों ने अपने गीतों में जल के महत्व को स्वीकारा है। यहाँ के गीतों, गाथाओं, लोकोक्तियों, मुहावरों, कथा-कहानियों में जल के महत्व का वर्णन मिलता है। अगर हम जल के महत्व को जान लें तो जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता को सुलझाने में हम अपना योगदान दे सकेंगे। हमारा कल्याणमय भविष्य इस बात पर टिका है, कि हम उपलब्ध जल के उपयोग में कितने सफल हो सकते हैं- वर्षा ऋतु हमारी नियति का महानाट्य है जिसके अभिनेता होते हैं ‘मेघ’ तभी तो हमारे लोक में मेघों का आवाहन होता है, हमारे देश में मेघोत्सवों, आल्हा, कजरी का आयोजन होता है। 

बुन्देली लोकगीत भी इसमें पीछे नहीं हैं तभी तो वे कहते हैं कि-

रूमक-झुमक चले अईयो रे
साहुन के बदला रे
फाग गीतों में कहा गया है कि -
गह तन गगर कपत तन थर-थर
डरत धरत घट सर पर।
गगरी के लेते ही वह थर-थर काँपती है तथा सिर पर घड़ा रखते हुए डरती है। वह डर को छोड़ती ही नहीं है- क्योंकि पानी भरने में एक पहर का समय लगता है।

कई लोकगीतों में जल के महत्व को इतने सुन्दर ढंग से वर्णित किया गया है, जो अवर्णनीय हैं।
जैसे-
न मारो कांकरिया लाग जेहे
कांकरिया के मारे हमारी गगरिया फूट जेहे
गगरिया के फूटे हमारी चुनरिया भीग जेहे
चुनरिया के भीगे हमारी सासुइया रूठ जेहे
सासुइया के रूठे हमारे बालमवा रूस जेंहे
बलमवा के रूसे हमारो पिहरवा छूट जेहे
इस लोकगीत में जल से भरी गगरिया के फूटने पर प्रिय के रुठने को बड़े ही सहज व शालीन ढंग से दर्शाया गया है। 

तो एक अन्य लोकगीत में माता सीता के जल भरने कुएं पर जाने का वर्णन कुछ इस तरह किया है-
जल भरन जानकी आई हो मोरी केवल माँ
कौन की बहुआ कौन की बिटिया
कौन की नार कहाई हो
मोरी केवल माँ
दशरथ बहुआ, जनक की बिटिया, 
राम की नार कहाई हो मोरी केवल माँ

तो कहीं माँ नर्मदा की तुलना माता-पिता से करते हुए बुंदेलखंडी बम्भोली सुनना अत्यंत कर्णप्रिय लगता है-
नरबदा मैय्या होssss
नरबदा मैया ऐसी मिली रे
ऐसी मिली रे जैसे मिल गए
महतारी और बाप रेssss
नरबदा मैया होssss

एक अन्य प्रसिद्ध परम्परागत बुन्देली विदाई गीत में माता-पिता के दुःख की उपमा सागर और गंगा जल से कुछ इस तरह दी गई है, कि किसी का भी हृदय भावुकता से भरे बिना नही रह पता और आँखें नम होकर बेटी के सुख, सौभाग्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगती हैं -
कच्ची ईंट बाबुल द्वारे न रखियो
बेटी न दइयो परदेस मोरे लाल
कौना के रोए गंगा बहत है
कौना के रोए सागर ताल मोरे लाल
अम्मा के रोए गंगा बहत है
बाबुल के रोए सागर ताल मोरे लाल


अत: जल हमारी अमूल्य धरोहर है। जल के बिना जीवन असम्भव है जल के कारण ही हमारा व प्रत्येक प्राणी का अस्तित्व है जल का संरक्षण हमारा कर्तव्य है और हमें अपने प्रयासों द्वारा अगली पीढी के लिए जल को बचाए रखना है। जल का सही उपयोग करें तथा दुरुपयोग होने से बचाएं। यह जान लेना चाहिए कि जल संरक्षित रहेगा तो धरती पर जीवन रहेगा।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

जीवन एक किताब ... संध्या शर्मा


जीवन एक किताब
अधूरी सी ..........
आने वाला हर दिन
एक कोरा पन्ना
हर दिन लिखती हूँ
भावों की इबारतें
कभी भरती हूँ
आशाओं की सरिता
प्रवाहों के बीच पड़े
बड़े-बड़े पत्थर
उनपर जमी
वक़्त की काई
साथ चलते दो किनारे
पेड़ों की घनी कतारें
डालियों पर गूंजता
पंछियों का कलरव 
सतरंगी किरणों को
पंखों में समेटे
फूल - फूल पर
मंडराती तितलियाँ 
भंवरों  का गुंजन
प्यारा सा गाँव
गुलमोहर की छाँव
रहट-रहट सी सांस
तिनका-तिनका आस
बैलों की रुनझुन
छप्पर-खलिहान
फूली सरसों
गमकते टेसू
बहती पुरवाई
उड़ती चूल्हे की राख
रंभाती गाय
मस्ती से उछलते बछड़े
बहती नदिया की
कल-कल धार
करती जीवन साकार
तो किसी पन्ने पर
पल्लू के कोने में बंधी
माँ की हिदायतें
कमरे से झाड़ी धूल
रसोई में पकते
खाने की खुशबू
चौकी-बेलन संग
खनकती चूड़ियों का
मिला-जुला राग https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgUxzKsTj2UTMvnC8X3ElPqAnA5c0ccj4HKbDIOGLjUPaWdwKTr6kqu8xmrsAwrg7sZrqp07_IvTunpM8cGkc_K6-ygVsTPQI3tYxv-QNIXlWSymAX-b1jBBesSh305ibBSVqNOx9NdQd0/s400/book+of+life.jpg
और भी न जाने
कितना कुछ है
अस्त-व्यस्त सा
समय कहाँ मेरे पास
सजाऊं-संवारूं इसे
मैं तो एक सैलानी हूँ  
अतीत-वर्तमान को
रोज समेटती हूँ
इन पन्नो पर 
समीक्षा के लिए
दे जाऊंगी समय को
उस दिन जब यह मेरी
जिल्द से लिपटी किताब होगी
तब यह सिर्फ मेरे नहीं
हर पढने वाले के हाथ होगी ........