सागर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सागर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

ये क्या है...? संध्या शर्मा

 ये क्या है?

ये पुलक है, ये झंकार है,

ये अधूरे बोलों का संचार है।

ये चुप्पी में सिमटा कोलाहल है,

ये मन से उठता हालाहल है।


ये क्या है?

ये प्राणों का प्रासाद है,

नभ के तारों का नीरव संवाद है।

ये अस्तित्व की साँस लेती रागिनी है,

ये क्षण भर में सदियों की यात्रा है।


ये क्या है?

ये रोम-रोम में बहती गंग है,

ये मौन के मुख से फूटा गीत अभंग है।

ये दो पल की ओस, सदियों का सागर,

ये तुम्हारे होने का अनूठा अहसास है।


ये क्या है?

ये प्रेम नहीं, प्रेम का सोत है,

ये दिया नहीं, स्वयं ज्योत है।

ये वेदना में पलता परमानंद है 

ये तुम हो... बस यही तो है।

बस चहुं ओर आनंद ही आनंद है।

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

आकांक्षा...संध्या शर्मा

आने वाला वर्ष सभी के लिए मंगलमय हो इसी कामना के साथ आप सभी को सहपरिवार नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ...

ओ अम्बर!
मैंने कभी नहीं  चाहा 
तुम्हारी ऊंचाईयों को छूना 
हमेशा डूबना चाहा 
तुम्हारे विस्तार में
बस इतनी चाहत है 
जड़े रहें चांद-सितारे
दामन में तुम्हारे 
सागर भी आकर 
चरण तुम्हारे पखारे 
और मैं 
पलकें बंद करके 
डूबी रहूँ
प्रीत की गहराईयों में ....

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

सम्मोहन ...

....
अनंत सागर के
खारे पानी में
अकेली खड़ी वह 
हर क्षण धीरे-धीरे  
घुलती जा रही है 
सांसें रुकने को हैं, 
जैसे-जैसे डूबती है 
सागर की लहरों में
विश्वास और ढृढ़ होता
गहरे खींचता है उसे 
अभिमानी, उद्दंड
पर उसकी भी जिद्द है
जीत कर ही मानेगी
सागर की विशालता
जितना डराती हैं
उतना ही उसकी ओर 
खिंची चली जाती है 
उद्दात लहरें 
आवाज़ देती हैं उसे 
हर बार बहा ले जाती हैं 
बहुत कुछ उसका 
सब लाना है वापस उसे 
वह अच्छी तरह जानती है
यह प्रलय नही है 
सिर्फ सम्मोहन है 
कुछ-कुछ मृत्यु जैसा

शनिवार, 19 मई 2012

आकांक्षा... संध्या शर्मा


खूब सो लिए जाग जाओ न, 
तुम आलस दूर भगाओ न.

कल कर लेना कल की बातें,
तुम गीत सुहाने दुहराओ न.

गहरे सागर से चुन-चुन कर,
चमकीले मोती ले आओ न .

जीवन की उर्वर धरती पर,
कुछ अपना सा बो जाओ न .

इन्द्रधनुष सा बनकर चमको,
तुम बादल जैसे छा जाओ न .

सांझ बीत गई रात आ गई,
अब चाँद को घर ले आओ न .

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

मुझे डर है... संध्या शर्मा

दरअसल मैं रेगिस्तान में ही पैदा हुई हूँ 
और तुम
ले जा रहे हो मुझे सागर में
मुझे प्यास नहीं कोई चाह नहीं
हाँ डर है...!
कहीं सागर निगल न ले
मेरे अस्तित्व को

ध्यान से देखो मुझे मैं तो पत्थर हूँ
और तुम
ले जा रहे हो मुझे हिमशिखर पर
पारस बनने की चाह नहीं
हाँ डर है 
कहीं पिघल ना जाऊं 
मोम बनकर...!

मैं तो एक बूँद हूँ, नन्ही सी ओस की
और तुम
बनाना चाहते हो बदली
नहीं घिरना चाहती झूमकर
हाँ डर है
कहीं बरस ना जाऊं
और समा जाऊं धरती में हमेशा के लिए...!