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अनंत सागर के
खारे पानी में
अकेली खड़ी वह
हर क्षण धीरे-धीरे
घुलती जा रही है
सांसें रुकने को हैं,
जैसे-जैसे डूबती है
सागर की लहरों में
विश्वास और ढृढ़ होता
गहरे खींचता है उसे
अभिमानी, उद्दंड
पर उसकी भी जिद्द है
जीत कर ही मानेगी
सागर की विशालता
जितना डराती हैं
उतना ही उसकी ओर
खिंची चली जाती है
उद्दात लहरें
आवाज़ देती हैं उसे
हर बार बहा ले जाती हैं
बहुत कुछ उसका
सब लाना है वापस उसे
वह अच्छी तरह जानती है
यह प्रलय नही है
सिर्फ सम्मोहन है
कुछ-कुछ मृत्यु जैसा
