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बुधवार, 18 जून 2025

सहनशीलता का प्रकाश... संध्या शर्मा


जब शरीर की थकी लकीरें  

आत्मा को घेर लेती हैं

और मन के कोलाहल में  

एक सन्नाटा छा जाता है।  


तब भीतर के मंदिर में  

खड़ी होती आत्मा विनीत

उस निराकार से पूछती  

जो है सबका अदृश्य नीड़।  


"क्या कहा?" – केवल चुप्पी

"क्या सुना?" – केवल स्थिरता

उत्तर सतह पर अक्षर नहीं

न उठा कोई स्वर चमत्कारी।  


उतरा वह अनुत्तर धीरे - धीरे

सहनशीलता की गहराई में 

सागर सा विशाल विस्तार

पर्वत सी अडिग मजबूती।  


एक ठहराव सा विश्वास

कि प्रत्येक रात के पश्चात  

उगता सूरज नया प्रकाश

हर तूफ़ान के बाद शांति।  


यह भाषा है बिना शब्दों की,  

एक वरदान है बिना माँग का

सहनशीलता में छुपा ज्ञान 

आत्मा को मिला परम उपहार


जब शब्द फीके पड़ जाते

तब सहनशक्ति बोलती है

भीतर के ईश्वर का स्वर  

चुपचाप समाधान देता है।  


धैर्य में छिपा है वह प्रकाश

जो दिखाता अँधेरे में मार्ग

आत्मा की थकान धुल जाती

जब बहती है सहनशीलता भक्ति के साथ...

----  संध्या शर्मा ----


मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

आशा पल्लव...

याद है तुम्हें ...?
उस नन्हे पौधे को रोपत़े हुए
कितने विश्वास से कहा तुमने 
जब यह दरख्त बन जाएगा 
एैसे फूल खिलेंगे  
जिससे सुवासित हो जाएँगे 
हमारे मन और आत्मा 
उस दिन हम यहीं मिलेंगे
गूँथ दूँगा मैं फूलों को
तुम्हारे जूड़े में 
सुगंध से तृप्त हो जाएगी
सदियों से अतृप्त
दोनो की आत्मा
बाँध देगी हमे  
प्रेम की मज़बूत डोर से 
जिसे थामकर पहुँचना है 
हमे संग-संग चलकर
जीवन के उस छोर तक
जिसके आगे कुछ भी नही 
ख़त्म होगी जहाँ हर सीमा 
उस अंतहीन अनंत की ओर
जहाँ विखंडित हो जाते है अणु
अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश में 
पा लेते हैं अपना मूल स्वरूप 
जहाँ असंभव है हर भेद-विभेद
लो मैं तो आ पहुँची हूँ वहीं 
प्रतीक्षा है उस क्षण की
जब तुम आकर पूर्ण कर दोगे 
यह जीवन यात्रा गाथा .....