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गुरुवार, 23 जून 2011

तेरी राह हूँ मंजिल नहीं......... संध्या शर्मा

तेरी राह हूँ
मंजिल नहीं
कश्ती हूँ
साहिल नहीं
वक़्त की आंधी चलेगी
इस तरह.............!
कश्ती कहीं
और साहिल कहीं
राह कहीं
मंजिल कहीं.............

रविवार, 29 मई 2011

क्यों नहीं अपनी हस्ती......... संध्या शर्मा


उसकी इजाज़त के बगैर जब पत्ता भी नहीं हिलता है,
वह ख़ामोशी से दुनिया का तमाशा क्यों देखता है ..
क्या सब कुछ उसकी मर्जी से ही होता है...?
क्यों नहीं अपनी हस्ती आप ही मिटा देता है ...?
ना होते गिरिजाघर, गुरूद्वारे,
ना मस्जिद, ना मंदिर होता.
ना कोई हिन्दू, मुस्लिम,
ना सिक्ख, ईसाई होता.
 ना कोई दुश्मन होता,
ना कोई किसी से नफरत करता.
दिल बनाकर उसमे झूठ और फरेब ना देता,
तो आपस में एक प्यार का रिश्ता ही होता..
हर रूप में इंसान यहाँ इंसान ही होता....

"ज़िन्दगी मर रही है,
मौत यहाँ जिन्दा है....
अपने बनाये जहाँ पर,
तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"     

गुरुवार, 5 मई 2011

चिड़िया............. संध्या शर्मा


ये नन्ही सी चिड़िया, मेरे बचपन की साथी,
 मुझसे बातें करती, मेरे संग थी गातीं .
इनका साथ मुझे खूब भाता,
पिछले जन्म का कुछ तो था नाता .
दिन भर इन्हें दाने थी चुगाती,
धूप में रहने पर माँ थी डांटती .
जैसे तैसे रात होती,
तो सपनों में मैं चिड़िया होती.
सुनहरे से पंखों वाली चिड़िया,
सुनहरी थी जिसकी दुनिया.
ज़ोर से दौड़ लगाती,
और दूर गगन में उड़ जाती.
कभी तितली संग इठलाती,
तो कभी भौरों संग गुनगुनाती.
सुबह जागती तो बड़ी खुश होती,
सपने वाली बातें माँ से कहती.
माँ पहले तो खूब हंसती,
फिर मुझसे यही कहती.
उड़ने अकेले मत जाया कर,
शैतान भाई-बहनों को भी संग ले जाया कर.
मैं जैसे-जैसे बड़ी होती गई,
वैसे-वैसे चिड़ियाँ कम होती गईं.
दाने अब भी डालती हूँ,
पर उन्हें वहीँ पड़ा पाती हूँ.  
न अब चिड़ियाँ  इन्हें चुगने आती है ,
और माँ भी बस यादों में ही आती है.
एक दिन अचानक...
एक चिड़िया मेरे घर में नज़र आई,
ख़ुशी से मेरी आँखें छलक आई.
मैंने पूछा इतने दिनों तक कहाँ थी,
मुझसे मिलने क्यों नहीं आती थी.
वह बोली.....!
मैं भी तुम्हे खोजती थी,
तुमसे मिलना चाहती थी.
उड़कर इधर उधर घूमती थी,
हर बार भटक जाती थी.
इंसानों ने जो ऊँचे-ऊँचे टॉवर लगाये हैं,
ये ही हमारे लिए मुसीबत लाये हैं.
हमें जाना कहीं और होता है,
और चले कहीं जाते हैं.
ये हमें बहुत सताते हैं,
हमें दिशा भ्रमित कर जाते हैं.
इतना कहकर वह फुर्र से उड़ गई,
और मुझे सोचने के लिए छोड़ गई.
मैं तो अभी भी चिड़िया ही बनना चाहती हूँ,
ऊँचे गगन में जी भरके उड़ना चाहती हूँ.
अब मैं इस सपने का क्या करूँ,
अगले जनम में चिड़िया बनूँ या न बनूँ ........     
   

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

लम्बी प्रतीक्षा...........! संध्या शर्मा

फिर बनेगा कोई नया राजा,  
फिर होगा राजतिलक...
फिर सजेंगे चौराहे,
निकलेंगे लम्बे जुलूस...
गूंजेंगे स्वागत गान,
होगी फूलों की बरसात...
अभिमान से ऊंचे होंगे,
मस्तक चापलूसों के...
और कुचल दिए जायेंगे,
असहमति के सर,
विजयी जुलूस तले...
किसानो ने की आत्महत्या,
कितने मरे भूख से,
कौन हुआ घायल,
भ्रष्टाचार की तलवार से...
बदल गया कुंठा में,
कितनो का आत्मविश्वास...
सारे के सारे प्रश्न,
खड़े होंगे चुपचाप...
हाथ बांधे,
निरीह सी आँखों में,
अनसुलझे से सवाल लिए,
एक जवाब की,
लम्बी प्रतीक्षा में....
 

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

क्रांति सूर्य उदय होगा...संध्या शर्मा


राख में दबी चिंगारी सुलग उठी,
ये मूक मूरतें पत्थर की,
लो जाग गई और बोल उठीं,
जब जनाक्रोश भड़कता है,
सिंहासन डोलने लगते हैं,
सरकार कांपने लगती है,
और ताज हवा में उड़ता है,
जिस और मोड़ना चाहता है,
ये काल उधर ही मुड़ता है,
विराट जनतंत्र गरज रहा,
इन्कलाब गगन में गूंज रहा,
जन-जन के शीश पर मुकुट धरो,
कोटि सिंहासन निर्माण करो,
अभिषेक प्रजा का जब होगा,
जो हुआ कभी न अब होगा..
और क्रांति सूर्य उदय होगा....!   

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

एक सवाल.......? संध्या शर्मा


सवाल क्यों करते हो
मैं पहेली नहीं हूँ
कलम मेरा हमसफ़र है
अकेली नहीं हूँ...

लोग सवाल पूछते रहे
मैं जवाब देती रही
जब कोई रास्ता न सूझा
तो उन्ही के साथ चलती रही

और.... 
खुद भी एक सवाल में
उलझकर रह गई हूँ
क्या मैं भी....?
अपनी एक अलग राह बना पाऊंगी
इन्हें भी अपने साथ चला पाऊंगी

या फिर ....
यूँ ही कुछ सवाल लिए 
एक अनबूझ पहेली की तरह
एक दिन खुद भी
इस दुनिया से चली जाऊंगी... 

गुरुवार, 17 मार्च 2011

"होली"........ संध्या शर्मा

डाल-डाल टेसू खिले, आ गया मधुमास,
फाल्गुन आया झूम के, ऋतू बसंत के साथ.

रंग अबीर से हो गया, अम्बर देखो लाल,
चूनर भीगी देख के, हुए गुलाबी गाल.



कोयल कुहू-कुहू कर रही, आम रहे बौराय,
रंग पिया की प्रीत का, मेरे मन को भाये.

 सिमट रहे है दायरे, अपने हो गए दूर,
अब होली - होली कहाँ, केवल है दस्तूर.



टूटे दिल न जुड़ सके, चले न मिलकर संग,
फिर कैसा किसके लिए, होली का हुडदंग.



इस बौछार में घोल दो, छल कपट और रंज,
रिश्तों में चलते नहीं, झूठे खेल प्रपंच.

होली प्रेम प्रतीक है, भावनाओं का मेल,
हिलमिल कर ही खेलिए, रंगों का यह खेल.

शब्द हमारे कर सकें, खुशियों की बौछार,
तभी सार्थक अपने लिए, होली का त्यौहार....

सोमवार, 14 मार्च 2011

"कल अपनी भी बारी है" ........ संध्या शर्मा



धरे रह गए साधन सारे,
नाकाम तकनीकें सारी हैं.

क्यों रोना अब देख तबाही,
जब खुद ही की तैयारी है. 


कुदरत के कानून के आगे,
क्या औकात हमारी है.

ऋषि मुनियों की तपोस्थली,
ये भारतभूमि न्यारी है.

शायद उनका पुण्यप्रताप ही,
अपने कर्मों पर भारी है.

थमा नहीं ये कहर देख लो,
वह तो अब भी जारी है.

संभल सको तो संभलो वर्ना,
कल अपनी भी बारी है...

हाँ कल अपनी भी बारी है.....