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सोमवार, 10 सितंबर 2012

कोई आया भी तो......संध्या शर्मा

जब बीत गया सावन  
घिरकर क्या करेंगे घन
सूखे मन के उपवन में
कोई आया भी तो क्या आया

ख़ुशी बसंती बयार हो
कोयल गीत गाती हो
बसंती राग पतझर ने
कोई गाया भी तो क्या गाया

लगी हो आग सावन में
तन-मन झुलसा हो
जल रहा गीत जब हो
कोई मल्हार गाया तो क्या गाया
                                                                                     
खुली रखीं प्रतीक्षा में
जाने कब से ये आँखें
थककर मूँद ली पलकें
कोई आया भी तो क्या आया

तड़पकर बूँद को जिसकी
प्यासा मर गया चातक
सजल घन मौत पर उसकी
कोई रोया भी तो क्या रोया

जीवन भर उजाले को
भटकती रही व्याकुल
जलाकर दीप समाधि पर
कोई लाया भी तो क्या लाया

शुक्रवार, 4 मई 2012

मनसरोवर के गीत ..... संध्या शर्मा

चातक की तरह 
स्वाति बूंदों को तरसती 
खुली सीप जैसी निर्जल आँखें 
मस्तिष्क में चलती रेतीली आंधियां 
ह्रदय में चुभते यादों के कांटे
मन के मानसरोवर में 
मौन गीतों के राजहंस 
अंतिम घड़ियाँ, अंतिम साँसें 
जीवन का सारांश खोजती 
कल्पना की आँखों से देखती वह 
दूर क्षितिज पर ढलता सूरज 
धौंकनी सी सांस लिए 
उत्तुंग शिखर पर चढ़ती जा रही है 
हाथों में थामे मौन गीतों की माला 
मद्धम पड़ती मंदिर की घंटियों की आवाजें 
तभी अचानक.....!
टूट गई मौन गीतों की माला 
बिखर गए मोती-मोती 
पथरा गई सागर सी गहरी आँखें 
उभर आया उनमे अंतिम दृश्य 
स्वर्णिम संध्या बेला 
छोटा सा सूना आँगन 
एक कोने में जलता नन्हा सा दीप 
जो चीर रहा है तम को 
फ़ैल रहा है चारों दिशाओं में 
प्रकाश-प्रकाश और प्रकाश....