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मंगलवार, 28 जून 2016

शब्द - शब्द अर्थ...

तुम्हारे पास
अर्थ हैं जितने 
मेरे पास
शब्द न उतने
बड़े मीठे है
तुम्हारे...
गीत अनसुने
बहुत सच्ची है
तुम्हारी...
कहानी अनसुनी
हर बात कहती हैं
मुझसे...
ये आँखें अनकही
अहसास झरने सा 
तुम्हारी...
पावन हँसी
संवार दो अलक
हौले से...
मेरे माथे पर पड़ी
ठीक से आती नहीं
मुझ तक...
तुम्हारे चेहरे की चाँदनी

रविवार, 17 मार्च 2013

पहचान... संध्या शर्मा

मेरी ही आँखें
मेरे ही अक्स को
घूरती हैं
अनजान की तरह
वो कुछ शब्द
जो यकीं दिलाते
मुझे मेरे होने का
क्यों नहीं बोलती
कितना मुश्किल है
इनकी ख़ामोशी तोडना
तुम कहते हो
आसान है सब
सच कहूँ....
कुछ भी अजीब नहीं लगता
आदत सी हो गई है
कर भी क्या सकती हूँ
फिर भी कोशिश में हूँ
अपनी ही आँखों में
अपनी पहचान ढूंढ़ने की
याद दिला सकूँ
कौन हूँ ??
जानती हूँ
बदल गई हूँ ....

सोमवार, 10 सितंबर 2012

कोई आया भी तो......संध्या शर्मा

जब बीत गया सावन  
घिरकर क्या करेंगे घन
सूखे मन के उपवन में
कोई आया भी तो क्या आया

ख़ुशी बसंती बयार हो
कोयल गीत गाती हो
बसंती राग पतझर ने
कोई गाया भी तो क्या गाया

लगी हो आग सावन में
तन-मन झुलसा हो
जल रहा गीत जब हो
कोई मल्हार गाया तो क्या गाया
                                                                                     
खुली रखीं प्रतीक्षा में
जाने कब से ये आँखें
थककर मूँद ली पलकें
कोई आया भी तो क्या आया

तड़पकर बूँद को जिसकी
प्यासा मर गया चातक
सजल घन मौत पर उसकी
कोई रोया भी तो क्या रोया

जीवन भर उजाले को
भटकती रही व्याकुल
जलाकर दीप समाधि पर
कोई लाया भी तो क्या लाया