स्वाति बूंदों को तरसती
खुली सीप जैसी निर्जल आँखें
मस्तिष्क में चलती रेतीली आंधियां
ह्रदय में चुभते यादों के कांटे
मन के मानसरोवर में
मौन गीतों के राजहंस
अंतिम घड़ियाँ, अंतिम साँसें
जीवन का सारांश खोजती
कल्पना की आँखों से देखती वह
दूर क्षितिज पर ढलता सूरज
धौंकनी सी सांस लिए
उत्तुंग शिखर पर चढ़ती जा रही है
हाथों में थामे मौन गीतों की माला
मद्धम पड़ती मंदिर की घंटियों की आवाजें
तभी अचानक.....!
टूट गई मौन गीतों की माला
बिखर गए मोती-मोती
पथरा गई सागर सी गहरी आँखें
उभर आया उनमे अंतिम दृश्य
स्वर्णिम संध्या बेला
छोटा सा सूना आँगन
एक कोने में जलता नन्हा सा दीप
जो चीर रहा है तम को
फ़ैल रहा है चारों दिशाओं में
प्रकाश-प्रकाश और प्रकाश....
