(1)
तू...
चली गई
अच्छा ही हुआ
रहती तो
दिल धडकता
अन्याय के
विरोध में
कभी तो
भड़कता
(2)
अब
सबकी
सुनती हूँ
दबा सकती हूँ
आवाज़ मन की
तू होती तो
हारती
रोज तुझसे
तेरा क़र्ज़
मैं चुकाती
(3)
देख
कैसी निर्लज्ज हूँ
तू नहीं है
फिर भी
बचा रखी हैं
कुछ साँसे
बिन तेरे भी
जीने के लिए
इस शरीर को
देती हूँ रोज
थोड़ी-थोड़ी