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शनिवार, 9 मार्च 2013

अंतरात्मा... संध्या शर्मा

(1)
 
तू...
चली गई
अच्छा ही हुआ 
रहती तो 
दिल धडकता 
अन्याय के 
विरोध में 
कभी तो 
भड़कता
 
(2)
 
अब
सबकी 
सुनती हूँ 
दबा सकती हूँ 
आवाज़ मन की 
तू होती तो 
हारती 
रोज तुझसे 
तेरा क़र्ज़ 
मैं चुकाती 
 
(3)
 
देख 
कैसी निर्लज्ज हूँ 
तू नहीं है 
फिर भी
बचा रखी हैं 
कुछ साँसे 
बिन तेरे भी 
जीने के लिए 
इस शरीर को 
देती हूँ रोज
थोड़ी-थोड़ी

बुधवार, 20 जुलाई 2011

मैं संसार सजाना चाहती हूँ...." संध्या शर्मा


अन्याय की धुआंधार बारिश में,
संघर्ष वृक्ष के बीज का,
तू अंकुर बन,
जड़ जमा ले गहरे तक और,
फल - फूल,
तूफान उठें, या
गरजें बादल,
तुझे आकाश छूना है,
अपने जैसे असंख्य बीजों को,
जन्म देना है.
"मैं एक वृक्ष नहीं, 
 जंगल उगाना चाहती हूँ...
 एक बाग नहीं,
संसार सजाना चाहती हूँ...."