तारों में हँसती
फूलों सी खिलती
आज भी इस मन में
बसती है तू
मिट्टी की खुश्बू
अब भी तुझे लुभाती है
पहिली बारिश में
अब भी भीगती है तू
अब भी संग मेरे
धूप में चलती है
आँचल की शीतल छाँव
अब भी करती है तू
मेरी अंखियों के झरोखों से
अब भी झांकती है तू
अब भी मन की देहरी पर
दीप जलाती है तू
बोलती सी आँखें तेरी
हरपल बतियाती हैं मुझसे
फिर भी दुनिया कहती है
मौन हूँ मैं
और मौन है तू....
अब भी करती है तू
मेरी अंखियों के झरोखों से
अब भी झांकती है तू
अब भी मन की देहरी पर
दीप जलाती है तू
बोलती सी आँखें तेरी
हरपल बतियाती हैं मुझसे
फिर भी दुनिया कहती है
मौन हूँ मैं
और मौन है तू....
