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शनिवार, 1 मार्च 2014

अन्नदाता की पुकार ....

"इश्क, मोहब्बत, व्यापार हो या हो कोई सरकार  
पेट में जब तक पड़े न रोटी, सब कुछ है बेकार!!!"

असमय बारिश
आंधी तूफ़ान
रूठ गया क्यों
इनसे भगवान
जस का तस
इनका दर्द
बढ़ता जाता
क़र्ज़ का मर्ज़
गीली आखें
पोंछ रहा
चुपचाप खड़ा
देख रहा
पानी में मिलते
खून पसीने से सिंचे
खेत - खलिहान
हलाकान- परेशान
कोई है जो सुने.... ?
धरती का कर्ज चुकाते
कृषि-प्रधान देश के
इन किसानो की
दु:ख-भरी दास्तान ...!!!