गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

"SARDI KI DHOOP"

"सर्दी की धूप"
दूर गगन से आई धूप
आसमान पर छाई धूप
सूरज के आँचल से उड़कर
धरती पर इतराई धूप
हटा घने कोहरे की चादर
चारों  ओर जगमगाई धूप 
आग उगलती गर्मी में ये
सर्दी में मुस्काई धूप
घिर आई जब काली बदली
हौले से शरमाई धूप
सूरज से सबने जोड़ा नाता
ऋतु सुहानी लाई धूप
दूर गगन से आई धूप ............ 

7 टिप्‍पणियां:

  1. That was a beautiful poem. Nice work, keep blogging.
    Bahut khoob. Ek ek pankti man ko chhoo gayi.

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  2. सर्दी की धूप का स्वागत आपने अपनी कविता में बहुत ही सुंदर तरीके से किया है।......शुभकामनाएं।

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  3. Dear Sandhya
    really nice and soothing effect giving poem.Imagination is wonderful.

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  4. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

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  5. You are a great poet.. Kitne saral shabdo me aap kitni gehri baat keh deti ho.

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