रविवार, 19 दिसंबर 2010

"DURGHATNA"

आज सुबह जैसे ही अखबार पर नज़र गई,
समाचार पढ़कर ही रूह कांप गई,
लिखा था .....
दुर्घटनाग्रस्त युवक तीन घंटे तक राह में पड़ा रहा, 
पुलिस व जनता सिर्फ देखती रही,
"क्या हो गया है, इंसानियत को,
कहाँ खो गई है मानवता,
गर वक़्त पर ईलाज हो  जाता,
तो शायद वह बच जाता,
भगवान न करे कहीं ऐसा होता,
वो तुम्हारा कोई अपना होता ........... "

5 टिप्‍पणियां:

  1. aaj ka samay kalyug ka hai...
    manavta to naam hi hai......dusro ki dukhi dekhkar kush hote hai log...

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  2. धन्यवाद् संजय जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए , सच है मन द्रवित हो उठता है,
    ऐसा लगता है काश हम वहां होते और कुछ कर पाते ...!

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  3. आज मानवता रही कहाँ है...सब अपने स्वार्थों में लिप्त हैं.

    ऐसे ही कुछ भाव मैंने अपनी रचना इंसानियत की मौत में व्यक्त किया है :
    सड़क दुर्घटना में मरनेवालों की
    संख्या एक और बढ़ गयी,
    लेकिन गिनती नहीं हुई
    उस इंसानियत की
    जो उसके साथ ही मर गयी.

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  4. कैलाश शर्माजी आपका कमेन्ट देखकर बहुत अच्छा लगा/ आपके सुझाव के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद ..

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