हर लम्हा - हर पल... संध्या शर्मा
लो गुज़र गया
एक और दिन
एक और झूठी आस में
अब हंसती भी हूँ
तो लगता है
अहसान कर रही हूँ
अपने आप पर
खुश्क आँखें भी अब
अश्क टपकाती नहीं
बस यूँ ही लगता है
हर लम्हा हर पल...
कि ....
तरस आ जाये कभी
वक़्त को भी
मुझ पर
क्योकि....
अब भी है आसरा तेरा
हर पल है अहसास तेरा
और ....
मिल जाये मुझे वो पल
जिसकी है तलाश मुझे
हर लम्हा - हर पल............
