यही है वह एकांतवही पेड़ और शाखाएं
स्मृतियों की छायाएँ
यहीं से उगा था
चाँद प्रीत का
यहीं मिले थे पहली बार
ठीक उसी जगह जा पहुंचे
जो जगहें जानी पहचानी थी
हमारा स्वागत नहीं करतीं
फिर क्यों आ जाते हैं यहाँ
बार-बार ………!!
शायद कोई फ़ागुनी बयार

उतार फेंके पातों के पीले पर्दे
सूनी डालों पर हरियाए
कुछ अपनापन
अलसाई दुपहरी में
बौरा उठे इनका भी मन
इन सूनी घडि़यों में
मन की बनकर धड़कन
देखो एक कली कुलबुलाई
सेमल के अरुण कपोलों पर
वासंती लाली छाई..........