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मंगलवार, 11 मार्च 2014

स्मृतियाँ

यही है वह एकांत
वही पेड़ और शाखाएं
स्मृतियों की छायाएँ
यहीं से उगा था
चाँद प्रीत का
यहीं मिले थे पहली बार
ठीक उसी जगह जा पहुंचे
जो जगहें जानी पहचानी थी
हमारा स्वागत नहीं करतीं
फिर क्यों आ जाते हैं यहाँ
बार-बार  ………!!


शायद कोई फ़ागुनी  बयार                                          
उतार फेंके पातों के पीले पर्दे
सूनी डालों पर हरियाए
कुछ अपनापन
अलसाई दुपहरी में                   
बौरा उठे इनका भी मन                    
इन सूनी घडि़यों में
मन की बनकर धड़कन                                
देखो एक कली कुलबुलाई
सेमल के अरुण कपोलों पर
वासंती लाली छाई..........