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गुरुवार, 2 जनवरी 2014

मरीचिका...

हर पल कल की आशा
हर पल से मुग्धता
एक डोर बांधे रखती है
जीवन को साँसों से
कुछ रहस्य का मोह
ज्ञात का सम्मोह
अज्ञात को जानने का मोह
और भी गहन हो जाता है
संसार में मेरा होना
हम सबका होना
संबंध पुरातन सनातन का
रहस्य उस शक्तिमान का
जो हर बार बच जाता है
उजागर होने से
प्रतीत होता है जैसे
गुहा के भीतर गुहा है
और उसके भीतर भी गुहा
जारी रहता है पल - छिन
आना और जाना 
फिर भी रह जाता है
अनबूझा ---- अनजाना ---------

गुरुवार, 21 मार्च 2013

बिरवा शब्द का.... संध्या शर्मा

संभव है वह भूल जाए
लेकिन मैंने संभाल रखा है
तुम न पहचानो मगर
बेखटके आता-जाता है
मेरी कविताओं में
उसका वह एक शब्द ...
देखना एक न एक दिन
मैं तुम्हारे मन में
रोप जाऊंगी बिरवा
उसी शब्द का
फिर खिलेंगे
तुम्हारे मन के द्वार पर
शब्दों के सुन्दर फूल
जिसकी खुशबू से
तुम्हारा आँगन ही नहीं
पूरा संसार महकेगा
बस तुम विश्वास रखना
मन का द्वार खुला रखना....!

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

रच दूंगी मै संसार निराला -------- संध्या शर्मा


महाप्रलय से भयभीत न होना
रच दूंगी संसार निराला
दुनिया की तस्वीर बना दूँ
जो रंग कोई हो भरने वाला


महाप्रलय से भयभीत न होना
रच दूंगी मैं संसार निराला

सतरंगी किरणें उतरेंगी
हर्ष का होगा नया उजाला
नए खग नए तरुवर होंगे
नया जग होगा मतवाला

महाप्रलय से भयभीत न होना
रच दूंगी मैं संसार निराला

सांच झूठ का नाम न होगा
होगी नई रवि की ज्वाला
 कोई अर्थ न दे पायेगी
अहंकार की अब मधुशाला

महाप्रलय से भयभीत न होना
रच दूंगी मैं संसार निराला

करुण कथा तेरे विनाश की
कोई न होगा सुनने वाला
विष का सृजन बहुत हो चुका
भर जाने दो अमृत प्याला

महाप्रलय से भयभीत न होना
रच दूंगी मैं संसार निराला

नयी सुबह और नए जगत का
अवसर नहीं अब टलने वाला
फ़िर झूम कर नाचे गाएगा
मधुर- मधुर बांसुरी वाला

महाप्रलय से भयभीत न होना
रच दूंगी मैं संसार निराला