भ्रष्ट आचरण की लाश कन्धों पर लिए,
निकल पड़ते हैं मौत के सौदागर,
आतंक और दहशत फ़ैलाने के लिए,
अनेकों के कुलदीपक बुझ जाते हैं,
कितने अपनों से बिछड़ जाते हैं,
तब खून पानी सा बहता है,
आंसू पानी बन जाते हैं,
और लहलहाते हैं,
साम्प्रदायिकता के बाग़,
खिल उठता हैं, आतंकवाद
जो चुभता हैं कांटे बनकर,
कर देता है बेगुनाहों के सीने छलनी,
इन्हें ख़त्म करने के लिए काँटों को नहीं,
पेड़ों को काटना होगा,
पूरा जड़ से ही,
हमेशा - हमेशा के लिए.....
निकल पड़ते हैं मौत के सौदागर,
आतंक और दहशत फ़ैलाने के लिए,
अनेकों के कुलदीपक बुझ जाते हैं,
कितने अपनों से बिछड़ जाते हैं,
तब खून पानी सा बहता है,
आंसू पानी बन जाते हैं,
और लहलहाते हैं,
साम्प्रदायिकता के बाग़,
खिल उठता हैं, आतंकवाद
जो चुभता हैं कांटे बनकर,
कर देता है बेगुनाहों के सीने छलनी,
इन्हें ख़त्म करने के लिए काँटों को नहीं,
पेड़ों को काटना होगा,
पूरा जड़ से ही,
हमेशा - हमेशा के लिए.....
