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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

बोलने लगते हैं चेहरे ....

...
मुखौटों के पीछे 
बरसो से मौन 
सहमे से बेजान
सिर्फ ढलते ही हैं 
जिनके सूरज    
एक ना एक दिन
झूठ से तंग आकर 
सच की सांस पाकर
खिल उठते हैं 
सुबह की धूप से   
और फिर हौले से 
बोलने लगते हैं चेहरे ...

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

मुखौटों की बस्ती.... संध्या शर्मा

http://www.janokti.com/wp-content/uploads/MasksChungSungJunGetty.jpgइतनी बडी बस्ती में
मुझे एक भी इंसान नहीं दिखता
चेहरे ही चेहरे हैं बस
किस चेहरे को सच्चा समझूँ
किसे झूठा मानूं
और उस पर इन सबने
अपनी जमीन पर बाँध रखी है
धर्म की ऊंची - ऊंची इमारतें
इन्ही में रहते हैं ये मुखौटे

क्षण प्रतिक्षण बदल लेते हैं
नाम, जाति, रंग‍,रूप

बसा रखा है सबने मिलकर
मुखौटों का एक नया शहर
जिन्हें चाहिए यहाँ सिर्फ मुखौटे
जिनमे मन, ह्रदय,
भावना कुछ नहीं
बस फायदे नुकसान के सबंध
इंसान जिए या मरे
कोई फर्क नहीं पड़ता 

इन मुखौटों को
लगे हैं
कारोबार में
श्मशान विस्तारीकरण के
ये नहीं जानते
मृत्यु केवल अंत नहीं
आरंभ भी है
भय नहीं आनंद भी है
जीवन एक परवशता,
अनिश्चितता है
सिर्फ और सिर्फ
मौत की निश्चितता है

साफ-साफ नज़र आने लगे हैं 
इन मुखोटों के पीछे छिपे चेहरे
बदलेंगे मुखौटे लेकिन 
नहीं बदलेंगे उनके चेहरे
इस सच्चाई के साथ
मैंने भी जीना सीख लिया है
मुखौटो की बस्ती में
अपना घर बना लिया है!!!!!