हे मानव...
हे वेदों के रचनाकार
पञ्च महाभूतों का विराट, विकराल रूप
क्यों व्यथित है, व्याकुल क्यों है?
हाथ फैलाकर बनता याचक क्यों है?
हे मानव...
तूने ही सूर्य को सूर्य कहा
तब सूर्य सूर्य कहलाया
तूने ही चाँद को चाँद कहा
तब चाँद, चाँद कहलाया
सकल विश्व का नामकरण तेरे ही हाथ हुआ
तेरी ही महिमा थी की यह सर्वमान्य हुआ
हे प्रतिभावान मानव
तू बन बैठा सर्वस्व
तूने ही आविष्कार किये
तूने ही विकसित की तकनीक
तूने ही रचे अणु, परमाणु बम
तूने ही चाँद पर रखे कदम
तेरे ही कारण सजी थी सुन्दर थी ये धरा
तेरे ही कारण नहीं रही वह पहले जैसी उर्वरा
सब कुछ तेरे कारण है सब कुछ तेरा है किया धरा...
हे वेदों के रचनाकार
पञ्च महाभूतों का विराट, विकराल रूप
क्यों व्यथित है, व्याकुल क्यों है?
हाथ फैलाकर बनता याचक क्यों है?
हे मानव...
तूने ही सूर्य को सूर्य कहा
तब सूर्य सूर्य कहलाया
तूने ही चाँद को चाँद कहा
तब चाँद, चाँद कहलाया
सकल विश्व का नामकरण तेरे ही हाथ हुआ
तेरी ही महिमा थी की यह सर्वमान्य हुआ
हे प्रतिभावान मानव
तू बन बैठा सर्वस्व
तूने ही आविष्कार किये
तूने ही विकसित की तकनीक
तूने ही रचे अणु, परमाणु बम
तूने ही चाँद पर रखे कदम
तेरे ही कारण सजी थी सुन्दर थी ये धरा
तेरे ही कारण नहीं रही वह पहले जैसी उर्वरा
सब कुछ तेरे कारण है सब कुछ तेरा है किया धरा...
