बिलकुल नए अँधेरे में आँखें मूंदकर देखे नवस्वप्न.... क्या होगा इनका साकार होंगे या टूट जायेंगे टूटना कोई नई बात नहीं साध्य पीढ़ी नई मेरी दृष्टी प्राचीन तो क्या हुआ जब रौशनी है आकाश है आशाओं का
भयावह काली रात बीत जाएगी उम्मीद है सूरज निकलने की हौसला है क्षितिज छूने का हमसे बचकर कहाँ जाएगी सुहानी भोर जरुर आएगी....