इस ब्रह्माण्ड की
दसों दिशाओं ने
शस्य स्यामला धरा की
मुस्काती फिजाओं ने
महकती हवाओं ने
झूमती लताओं ने
बल-खाती नदियों ने
कल-कल बहते झरनों ने
माटी के धोरों ने
कर्मठ शूरवीरो ने
मिट्टी के कण कण ने
स्वदेश के जन जन ने
कह दी अमर कहानी
सब गर्वित हैं मातृभूमि पर
सिवाय उनके ....
जो बैठे रहे सिर्फ ढोंग रचाकर
न खुद समझ सके 'देशप्रेम'
न किसीको समझा पाए...
दसों दिशाओं ने
शस्य स्यामला धरा की
मुस्काती फिजाओं ने
महकती हवाओं ने
झूमती लताओं ने
बल-खाती नदियों ने
कल-कल बहते झरनों ने
माटी के धोरों ने
कर्मठ शूरवीरो ने
मिट्टी के कण कण ने
स्वदेश के जन जन ने
कह दी अमर कहानी
सब गर्वित हैं मातृभूमि पर
सिवाय उनके ....
जो बैठे रहे सिर्फ ढोंग रचाकर
न खुद समझ सके 'देशप्रेम'
न किसीको समझा पाए...