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शुक्रवार, 13 मार्च 2015

मन, शहरी नही हुआ ...

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रोटी, मन, गाँव, शहर
सब्जी तरकारी में
फूलों की क्यारी में
रोटी के स्वाद में 
पापड़ अचार में 
मेवों पकवानों में
ऊँचे मकानों में 
बूढे से बरगद में
शहरों की सरहद में 
तीज त्योहार में 
मान मनुहार में
लोक व्यवहार में 
नवीन परिधान में 
बेगानो की भीड़ में 
संकरी गलियों में 
मौन परछाइयों में 
कांक्रीट की ज़मीन में 
धुँआ-धुँआ आसमां में 
अब भी गाँव ढूँढता है 
मन, शहरी नही हुआ ....