शब्दों की भीनी मिठास
भावों की महक को
जब शृंगार के जल में
व्याकरणी दूध खौलाकर
डबकाते होगें कुछ देर
तो कविता सी
बनती होगी चाय उनकी
ताज़गी से भरपूर
दार्जलिंगी गमक लिए
महकते शब्दों को
जायकेदार ख़ुश्बू संग
खूब खौलाते हैं
बड़ी शिद्दत से वो
जैसे चाय नही पक रही
कोई कविता उबल रही हो
उबलेगी, खौलेगी, छनेगी
फ़िर प्रस्तुत की जाएगी
प्यालियों रकाबियों में \
किताबों की तरह
व्यवस्था परिवर्तन के लिए
क्रांति का उद्घोष करती...


