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शनिवार, 5 जुलाई 2014

करतब...



मुक्ति पा लेता है........!
अपराधी एक बार सूली पर चढ
वह निरपराध पेट की खातिर
सूली पर चढती है रोज - रोज
रस्सी पर डगमगाते नन्हे पाँव
किसी के लिए मनोरंजन भले हो
इसके लिए साधन है पेट भरने का
मौत के खेल को तमाशा बना
नन्हे नन्हे कदम आगे बढाती वह
जब सुनती है तालियों की आवाजें
तो डर से सहम सी जाती है 
बहकने लगती उसकी चाल
वह तुरंत साध लेती है खुद को
क्योंकि डगमगाना कारण बन जाएगा
उसके परिवार के भूखे रहने का
अभी उसे तो उस पार जाना है
जीवन और मृत्यु का करतब दिखाना है
और रोज जीतना है मृत्यु को
निरपराध होकर भी 
यही नियति है……………।