ऐसी ही है वह
खूब बोलना चाहती है
पर बोलती नहीं
जब बोलने को कहो
कह देती है
कुछ नहीं कहना
हाँ लेकिन उसी वक़्त
उन मुरझाई आँखों से
टपक जाती हैं
दो बूंदें........!
बिलकुल दर्पण की तरह
बिलकुल दर्पण की तरह
जिसमे झलकता है
उसका प्रतिबिंब
झुर्रियों भरा चेहरा
स्पष्ट उभर आती हैं
अनगिनत रेखाएं
आखिर उन बूंदों पर
इन अनगिनत
आड़ी-टेढ़ी लकीरों से
इन अनगिनत
आड़ी-टेढ़ी लकीरों से
क्या लिख देती है वह....?
