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मंगलवार, 27 जनवरी 2015
पुरानी ज़िद...
अक्षर अक्षर
शब्द मेरे
जानती नहीं
कब हो गए
भाव तुम्हारे
इस सफ़र का
पता ही न चला
करने लगे हो
मेरे ही मन में
खूब मनमानी
और देखो न
इठलाती इतराती
अल्हड़ बच्ची सी
मैं आज भी
लगी रहती हूँ
तुमसे अपनी
हर बात मनवाने की
उसी पुरानी ज़िद में
नई नई
ज़िद
लेकर....
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