मान गए बादल रूठे 
बरसे तो जमकर बरसे
धरती रही
फिर भी प्यासी
व्याकुल हो उठा मन
देखकर व्यर्थ जाता
जीवन जल
ऐसा लगता है
वर्षा का सारा जल
भर लूँ अंजुरी में
ताकि....!
ना बह सके
ना बिखरे
ना व्यर्थ हो
एक भी बूँद
हर एक बूँद
धरती में समाये
लहराए इठलाये
नदी बन जाये
सजाये प्रकृति का स्वरुप
निखरे उसका रंग - रूप
खिले कोपल तरुवर पर
गूंजे कोयल का स्वर
पवन स्पर्श से
जैसे बिखरे गुलाल
सुन्दर फूलों से
शोभित हो हर डाल
फैली हो हरियाली चहुँ ओर
नाच उठे धरती का मनमोर...!

बरसे तो जमकर बरसे
धरती रही
फिर भी प्यासी
व्याकुल हो उठा मन
देखकर व्यर्थ जाता
जीवन जल
ऐसा लगता है वर्षा का सारा जल
भर लूँ अंजुरी में
ताकि....!
ना बह सके
ना बिखरे
ना व्यर्थ हो
एक भी बूँद
हर एक बूँद
धरती में समाये
लहराए इठलाये
नदी बन जाये
सजाये प्रकृति का स्वरुप

निखरे उसका रंग - रूप
खिले कोपल तरुवर पर
गूंजे कोयल का स्वर
पवन स्पर्श से
जैसे बिखरे गुलाल
सुन्दर फूलों से
शोभित हो हर डाल
फैली हो हरियाली चहुँ ओर
नाच उठे धरती का मनमोर...!