शुक्रवार, 6 मार्च 2026
हर एक सफर की कहानी लिखो... संध्या शर्मा
रविवार, 22 फ़रवरी 2026
इक ऐसी जगह हो...!
न जाने कब से सोच रही हूँ
ऐसी जगह जाने की,
जहाँ जाते ही जगहें
मुझे गले लगाते हुए पूछें—
"इतने दिन कहाँ थी? कैसी है?"
जहाँ हर पेड़ मेरा नाम जानता हो,
हर पत्ता मेरे आने की ख़बर पंछियों को दे,
और हवा का झोंका बिना कुछ कहे
यूँ ही सर पर हाथ फेर दे।
जहाँ दरवाज़े मुझसे रूठें नहीं,
बल्कि खुलते ही मुस्कुरा उठें,
और देहरी पाँव रखते ही धीरे से कहे—
"बहुत दिन हुए, आई क्यों नहीं।"
जहाँ सुबह की धूप मेरी रज़ामंदी ले,
फिर आँगन में उतरे,
और शाम ढलते-ढलते
मेरे माथे पर चाँदनी का टीका लगा दे।
ऐसी जगह... शायद कोई गाँव हो,
कोई पहाड़, कोई नदी का किनारा,
या शायद कोई ऐसा घर,
जहाँ मैं ख़ुद को थका हुआ ना पाऊँ।
या फिर...
ऐसी जगह कोई और नहीं,
बस वो हो.....!
जिसकी आँखों में खोकर
मैं ख़ुद को फिर से पा लूँ।
बुधवार, 3 दिसंबर 2025
ये क्या है...? संध्या शर्मा
ये क्या है?
ये पुलक है, ये झंकार है,
ये अधूरे बोलों का संचार है।
ये चुप्पी में सिमटा कोलाहल है,
ये मन से उठता हालाहल है।
ये क्या है?
ये प्राणों का प्रासाद है,
नभ के तारों का नीरव संवाद है।
ये अस्तित्व की साँस लेती रागिनी है,
ये क्षण भर में सदियों की यात्रा है।
ये क्या है?
ये रोम-रोम में बहती गंग है,
ये मौन के मुख से फूटा गीत अभंग है।
ये दो पल की ओस, सदियों का सागर,
ये तुम्हारे होने का अनूठा अहसास है।
ये क्या है?
ये प्रेम नहीं, प्रेम का सोत है,
ये दिया नहीं, स्वयं ज्योत है।
ये वेदना में पलता परमानंद है
ये तुम हो... बस यही तो है।
बस चहुं ओर आनंद ही आनंद है।
बुधवार, 16 जुलाई 2025
एक ख़त बीते लम्हों के नाम... संध्या शर्मा
एक ख़त लिखना चाहती हूँ मैं,
उन गुजरे पलों के नाम,
जो छू गए थे मन को कभी
और खो गए थे वक़्त के अंधेरों में।
काग़ज़ पे उतर आएँगे,
कुछ धुंधले से चेहरे,
हँसती आँखें, अधूरे ख़्वाब
और वो बिखरी चुप्पियाँ।
हर शब्द होगा एक दर्द,
हर पंक्ति एक सिसकी,
मगर ये ख़त पढ़ेगा कौन?
वक़्त तो बहरा है...!
भेजूँगी नहीं इसे कहीं मैं,
रख दूँगी दिल की किसी कोठरी में,
जहाँ गूँजती रहेगी हर पंक्ति
एक अनसुनी कहानी की तरह।
बुधवार, 18 जून 2025
सहनशीलता का प्रकाश... संध्या शर्मा
जब शरीर की थकी लकीरें
आत्मा को घेर लेती हैं
और मन के कोलाहल में
एक सन्नाटा छा जाता है।
तब भीतर के मंदिर में
खड़ी होती आत्मा विनीत
उस निराकार से पूछती
जो है सबका अदृश्य नीड़।
"क्या कहा?" – केवल चुप्पी
"क्या सुना?" – केवल स्थिरता
उत्तर सतह पर अक्षर नहीं
न उठा कोई स्वर चमत्कारी।
उतरा वह अनुत्तर धीरे - धीरे
सहनशीलता की गहराई में
सागर सा विशाल विस्तार
पर्वत सी अडिग मजबूती।
एक ठहराव सा विश्वास
कि प्रत्येक रात के पश्चात
उगता सूरज नया प्रकाश
हर तूफ़ान के बाद शांति।
यह भाषा है बिना शब्दों की,
एक वरदान है बिना माँग का
सहनशीलता में छुपा ज्ञान
आत्मा को मिला परम उपहार
जब शब्द फीके पड़ जाते
तब सहनशक्ति बोलती है
भीतर के ईश्वर का स्वर
चुपचाप समाधान देता है।
धैर्य में छिपा है वह प्रकाश
जो दिखाता अँधेरे में मार्ग
आत्मा की थकान धुल जाती
जब बहती है सहनशीलता भक्ति के साथ...
---- संध्या शर्मा ----
शुक्रवार, 21 मार्च 2025
अमर काव्य, जीवन आधार... संध्या शर्मा
कविता, शब्दों का जादू,
भावनाओं की सरिता,
इसकी हर पंक्ति में छुपा है,
संसार, अद्भुत, अनोखा।
कभी खुशियों के रंग बिखेरे,
कभी गम की छाया ले आए,
कविता तो मन का आईना है,
जो दिल की बात कह जाए।
कभी तुकों में बंध बनती,
लय, छंदों में बहता संगीत,
ये तो आत्मा की भाषा है,
जो हर पल रचे नया गीत।
कलम से उतरती है ,
दिल की गहराई में जन्मती,
कविता तो अमर है,
हर युग में जीवंत रहती।
शब्द ब्रह्म अक्षर अनंत,
कविता है सृष्टि का सार,
हर पंक्ति में ब्रह्मांड बसा,
अमर काव्य जीवन आधार।
बुधवार, 5 जून 2024
हरियाली खुशहाली है... संध्या शर्मा
बच्चों आओ मैं हूँ पेड़
मुझे लगाओ करो ना देर
जब तुम मुझे उगाओगे
धरती सुखी बनाओगे
दुनिया मेरी निराली है
हरियाली खुशहाली है
रोको मुझपर होते प्रहार
मैं हूँ जीवन का आधार
छाँव फूल फल देता हूँ
तुमसे कुछ नही लेता हूँ
वायू जहरीली पीता हूँ
शुद्ध हवा तुम्हें देता हूँ
प्रकृति का सम्मान करो
वसुंधरा का तुम ध्यान धरो
मेरा मन भी बहुत रोता है
दुख मुझको भी होता है
अब तो मुझको ना काटो
टुकड़ों टुकड़ों में ना बांटो
मुझसे ही बनते हैं उपवन
मैं हूँ, तो जीवित हैं ये वन
देता हूँ पंछी को ठिकाना
और चिड़ियों को दाना
रूठी प्रकृति को मनाना
कहते थे ये दादा नाना
बात उनकी तुम मानोगे
घर - घर पेड़ लगाओगे
बुधवार, 20 मार्च 2024
जगह दे दो मुझे अपने आंगन में- संध्या शर्मा
ओ गौरैया!
नन्ही सी तुम
कितनी खुश थी
अपनी मर्जी से
चहचहाती थी
जब जी चाहे
सामर्थ्य भर
भरती थी उड़ान
छू लेती थी आसमान
चहचहाती थी
जहां जी चाहे
उन्मुक्त होकर
फुदकती रहती थी
किसने लगा दी
रोक-टोक तुम पर
क्या मेरी तरह
लग गए है तुम पर
रीति - रिवाजों
परंपराओं के बंधन
क्यों लुप्त हो गई तुम
कहो ना कुछ कहो तो
क्या खोज ली है तुमने
कोई और दुनिया?
तो बुला लो मुझे भी
वहीं जहां तुम हो....!
जगह दे दो मुझे
अपने आंगन में ....
शुक्रवार, 8 मार्च 2024
मेरी मां सबसे प्यारी-संध्या शर्मा
हम तीन बहनों और एक भाई की मां। बहुत प्यारी, बहुत कुशाग्र बुद्धि वाली थी। मां ने राजनीति, समाज और गृहस्थी हर जगह अपनी कुशलता दिखाई। आज भी जबलपुर में 'इंद्रावती शर्मा' सिर्फ़ नाम ही काफी है उनकी कीर्ति को जानने के लिए।
हम बच्चों के पालन पोषण से लेकर शिक्षा, व्यवसाय, शादी विवाह हर फैसले उन्ही के होते थे, जो आज भी उनकी सफलता के प्रमाण हैं।
मां ने अपनी बेटियों ही नही बल्कि अनेक अनाथ बेटियों के विवाह अपने दम पर किए और आजन्म उनकी भी मां का फ़र्ज़ निभाती रही।
मां ने बेटियों पर शोषण के विरोध में समाज के सामने आकर आवाज़ उठाई और उन्हे उनका हक़ दिलाया।
उन्होंने बचपन में किस्से कहानियों के माध्यम से नैतिक शिक्षा दी हमे। चंदामामा, पराग, पंचतंत्र की कहानियां जैसी पुस्तकें हमारे लिए पढ़ना उनकी आज्ञा होती थी। रामायण की चौपाइयों से अंताक्षरी खेलती थी। काग चेष्टा, बकुल ध्यान, स्वान निद्रा जैसी सीख आज भी याद है। टंग ट्विस्टर सिखाती। ताश के खेल जिसमें ट्वेंटी नाइन उनका प्रिय खेल था! उनके जाने के बाद कभी नहीं खेल सके हम।
एक बार का किस्सा याद आता है। हम छोटे ही थे तब। पड़ौस की एक बहु के पैर में फ्रेक्चर के बाद प्लास्टर था, पैसे की कमी और परिवार की अनदेखी में वह उस प्लास्टर को समय सीमा के बाद भी मज़बूरी वश ढो रही थी! एक दिन वह मां के पास आई। मां ने उन्हें अस्पताल चलने को कहा तो उन्होंने कोई परेशानी बताई। मां ने अपने हाथों से प्लास्टर काट कर उन्हे उससे निजात दिलाई और कुछ दिनों बाद उन्हें ले जाकर डॉक्टर को दिखाया भी।
हर परेशानी का हल चुटकियों में करने वाली मां की दोनों किडनी खराब हो गई थी। बहुत तकलीफ़ उठाई उन्होंने। जब बीमारी का कोई इलाज़ ना हो तो इंसान इधर उधर किसी अन्य पैथी या चमत्कार के पीछे भागता है।
इसी के तहत एक बार किसी ने कहा कि कुछ ' उतारा' जैसा होता है, उसे करके चौराहे पर डाल दो। लेकिन अंधविश्वास को न मानने वाली मां ने सीधे सादे शब्दों में कहा था "मुझे ईश्वर ने जो कष्ट दिए हैं , मैं उसे उनकी इच्छा समझकर भुगतने को तैयार हूं, और मैं कभी भी नही चाहूंगी कि किसी दुश्मन को भी मेरे बदले ये कष्ट हो"
एक बार की बात है मां अर्धचेतना की अवस्था में डायलिसिस के लिए हॉस्पिटल में भर्ती थी। रात के लगभग दो बजे डॉक्टर ने उन्हें बॉल दबाकर उंगलियों की एक्सरसाइज करने कहा। हम सब परेशान थे कि इतनी रात को बॉल कहां से मिलेगी। घर भी काफ़ी दूर था। तभी मां ने धीरे से आंख खोली और भाई को पास बुलाकर धीरे से कहा बेटा! परेशान मत हो! रुई का गोला बना और पट्टियों को लपेटकर बॉल बना दे।" इतनी तकलीफ़ में भी अपने बच्चों की तकलीफ़ नही देख सकती थी वो मां।
अपने अंतिम समय में जब भी हम सब उनके लिए कोई उपाय करने में लगते वो कहती "गोइंठा में कितना भी घी डालोगे वो सूख जाएगा। मत डालो!" क्योंकि उन्हें समझ रहा था उनका इलाज़ करवाना आसान नहीं है।
capd करवाया गया था उनका। साधारण डायलिसिस उनका शरीर झेल नही पा रहा था। सारी सावधानियों के बाद भी उन्हें इन्फेक्शन हो गया। बहुत कोशिश की गई।
मैं नागपुर में ही थी। मां ने अंतिम बार मुझसे फोन पर बात की! मुझे उनकी आवाज़ में इतना दर्द महसूस हुआ कि मैने उस समय ईश्वर से प्रार्थना की "हे ईश्वर मां को अपने पास बुला ले। हमारे लिए इतनी तकलीफ़ में मत जीने दे उसे। मत रोने दे उसे दर्द सह सहकर! अब मां नही हम रो लेंगे!"
और इस तरह मैं अंतिम बार उनके वो शब्द"बेटा तू आ जा मेरे पास" भी नही सुन पाई!
ईश्वर भी जैसे बस हमारे कहने की राह देख रहा था। सिर्फ़ पचास की छोटी सी उम्र में मां ईश्वर के पास चली गई।
मां की हर सीख याद है मुझे। हर समस्या का हल उन्हे, उनकी बातों को याद करते हल करती हूं। हर पल उन्हे महसूस करती हूं। अब तो आईने में भी माथे पर पड़ती लकीरों में वो दिखाई देने लगी है ।
सब कहते हैं मैं मां सी हूं। बहुत कोशिश करती हूं, कि मां जैसी बनूं। लेकिन नही बन सकती मैं उसके जैसी मैने कहा न "मेरी मां सबसे प्यारी"
संध्या शर्मा
शनिवार, 13 जनवरी 2024
हम सदा रहेंगे...
उस दिन....!
जब ना हम होंगे ना तुम
तब भी मिलेंगे
अपनी कविताओं में
हम तुम
धरती आकाश होंगे
चांद सूरज होंगे
बारिश भी होगी
बसंत भी आएगा
नदियां, झरने, पंछी
झाड़-पेड़ , पहाड़ होंगे
यह होने का क्रम
चलता रहेगा
और इसी तरह
हम थे
हम हैं
हम सदा रहेंगे...
____संध्या शर्मा ____
शनिवार, 22 अप्रैल 2023
अकती पूजन कैसे जाऊँ री, बरा तरें ठाडे लिवौआ...
हिंदू धर्म में प्रकृति के सभी तत्वों की पूजा, प्रार्थना का प्रचलन और महत्व है, क्योंकि हिंदू धर्म मानता हैं कि प्रकृति से ही हमारा जीवन संचालित होता है। इसीलिए प्रकृति को देवता, भगवान और पितृदेव माना गया है। हिन्दू संस्कृति के अधिकतर तीज त्योहार और पर्व परंपराएं प्रकृति से ही जुड़ी हुई हैं। ऐसा ही एक त्यौहार है "अक्षय तृतीया"
अक्ति, अकती, अक्षय तृतीया, आखा तीज ...अनेक नामों से जाना जाने वाला यह त्यौहार बुंदेलखंड में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। बैशाख मास के शुक्ल पक्ष में तीज के दिन का यह पर्व कुंवारी कन्याओं एवं विवाहित महिलाओं के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस पर्व को कृषक भी बड़े उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाते हैं। सबसे पहले चार कलशों में पानी भरकर, पूरे गए चौक पर रखा जाता है। इन घड़ों पर वर्षा के चार माहों- क्रमशः असाढ़, सावन, भादों तथा कुंआर के नाम लिखे जाते हैं। इन घड़ों पर अमियाँ (कच्चे आम) और रोटियाँ रखी जातीं हैं तथा प्रत्येक घड़े में चनों के दाने डाल दिए जाते हैं।
तत्पश्चात पूजा-होम आदि करके प्रतीक्षा की जाती है। दूसरे दिन जिस घड़े के चने फूल जाते हैं, उस घड़े पर अंकित मास में ही वर्षा होगी, ऐसा अनुमान व विश्वास किसानों में होता है। इस तरह ही इस त्यौहार से कृषि-वर्ष का आरम्भ माना जाता है। गाँव का मुखिया ’बसोरों’ से बाजा बजवाता हुआ किसानों के साथ खेत पर नया ’बखर’ लेकर जाता है। पंडित या पुजारी उस बखर की पाँस पर गोबर और हल्दी लगाकर पूजन करता है।
इसके बाद खरीफ फसल के अन्नों- ज्वार, उड़द, मूँग, तिल, मक्का आदि के दाने और सवा रुपया बखर पर रखकर मुखिया/जमींदार पूजन करता है। रुपये, दाने और मिट्टी को अपने हाथ से उठाता है और उन दानों को खेत में बोकर हल/बखर चलवा देता है। ऐसे ही अन्य किसान भी अपने-अपने खेतों पर जाकर करते हैं। अंत में सभी लोग मुखिया या जमींदार के घर जाते हैं, जहाँ उन्हें पान और स्त्रियों को घुघरी (उबले हुए गेहूँ तथा चने) दी जाती है।
कन्यायें और स्त्रियाँ संध्या होते ही ’अकती’ के गीत गाते हुए किसी सरोवर या नदी पर जाती हैं और सोन (भीगी हुई चना दाल) वितरित करतीं हैं। कन्यायें पुतला पुतलियाँ सजातीं हैं। वट वृक्ष के नीचे उनका विवाह और पूजा करतीं हैं। स्त्रियाँ परस्पर हास्य-विनोद करती हुई, अपने-अपने पतियों के नाम जोड़कर इस प्रकार हंसी ठिठौली करती हैं-
’टाठी भरो घिऊ, हमाओ और ........ को एकई जिऊ।’
इसी प्रकार नवविवाहित किशोरियाँ भी ’दिनरियाँ’ या ’दुलरियाँ’ इन शब्दों में गाती हैं-
’अकती खेलन कैसे जाऊँ री,
बरा तरें ठाडे लिवौआ।
मेले री मेले मोरी सकियन के मेले।
ससुरा के संग न जाऊँ री,
बर तरें ठाडे लिवौआ।’
अक्ति के लान कैसे जाऊँ री ,
जे राजा रो रये हिलकिया
रो रये हिलकिया
लाल करें अँखियाँ ….
बेटियों के लिए यह त्यौहार आजन्म अपने बचपन की मीठी यादों की पोटली समान होता है। यह त्यौहार आते ही कल्पनाओं में चलचित्र की भांति विचरने लगते हैं वो प्यारे - प्यारे गुड्डे - गुड़ियाँ, जिनका ब्याह रचाने की तैयारियों में न जाने कब बीत जाता है सखियों संग हंसी - ठिठौली करते वो सुनहरा सा बचपन...
विवाह गुड्डे गुड़िया का होता है परन्तु घर में उत्साह विवाह जैसा ही होता है। गुड्डा-गुड़िया के विवाह से बच्चों को गृहस्थी की सीख मिलती है कि आने वाले समय में वे कुशल माता-पिता बनकर अपनी संतति, परिवार एवं समाज व देश के प्रति अपने दायित्यों का निर्वहन सफ़लता से करें। एक तरह से यह समाज के लिए उत्तम नागरिक बनाने की प्रक्रिया है।
शहरों में तो मिट्टी का घड़ा कभी भी खरीद कर लोग पानी पीना शुरु कर देते हैं, परन्तु ग्रामीण अंचल में यह परम्परा आज भी जीवित है कि अक्ति के दिन से नये घड़े का जल पीना प्रारंभ किया जाता है।
"पीहर' याद आता है
माँ' याद आती है
अक्ती की पुतरियाँ
इशारों से बुलाती हैं
"आज भी जब नए घड़े के पानी से
सोंधी-सोंधी खुश्बु आती है ..."
अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु के छठें अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। परशुराम ने महर्षि जमदाग्नि और माता रेनुकादेवी के घर जन्म लिया था। यही कारण है कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। इस दिन परशुरामजी की पूजा करने का भी विधान है।
अक्षय तृतीया के दिन ही पांडव पुत्र युधिष्ठर को अक्षय पात्र की प्राप्ति भी हुई थी। इसकी विशेषता यह थी कि इसमें कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था।
अक्षय तृतीया के अवसर पर ही महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत लिखना शुरू किया था। महाभारत को पांचवें वेद के रूप में माना जाता है। इसी में श्रीमद्भागवत गीता भी समाहित है।
अक्ति का त्यौहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस दिन पितरों का पिंड दान किया जाता है। जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कुल में मिलाने का कार्य भी इसी दिन होता है। इस दिन पितर कुल में मिले हुए को आगामी पितृपक्ष में पिंड दान दिया जाता है, अन्य पितरों के साथ उसका भी तर्पण किया जाता है।
मान्यता हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है।
इस तरह समस्त अंचल में अक्ति (अक्ष्य तृतीया) धूम धाम से मनाया जाता है।
भले ही हम आधुनिक युग के भौतिक प्रपंचों में उलझकर परम्पराओं से विरक्त हो रहे हैं, परन्तु इन परम्पराओं का निर्वहन हमें अपनी माटी से जोड़ता है। अपनी संस्कृति से, अपने पुरखों से जोड़ता है, अपने इतिहास एवं समाज से जोड़ता है। इसलिए हमें अपने परम्परागत त्यौहारों को कभी नहीं भूलना चाहिए।
शनिवार, 4 जून 2022
क़वायद .... ! - संध्या शर्मा
जब बारिश आती है
शुरू हो जाती है
क़वायद .... !
एक तरफ धरती की
दूसरी ओर इंसान की
धरा ढूंढती है कॉन्क्रीट के बीच
जल को आत्मसात करने की जगहें
और इंसान तलाशता है
पानी से बचने का ठौर
__संध्या शर्मा__
मंगलवार, 31 मई 2022
परवाज़...संध्या शर्मा
एक दिन चित्रकार, ब्लॉगर, साहित्यकार उषा किरण जी ने फेसबुक पर लिखा "India Art Fair 2022, Delhi में देखी गई कलाकार `सोमा दास ‘ की क्रम से लगी ये पाँच पेंटिंग्स `Made For Each Other ’ मेरे दिल में बस गई है ….ध्यान से देखिए तो इस पेंटिंग में छिपी एक कविता भी नजर आती है मुझे" और उन्होंने हमारे आग्रह पर अपनी वह कविता साझा करने के साथ - साथ मुझे भी कविता लिखने को कहा - यह वही पेंटिंग है, और वही कविता जो हमने उनके आग्रह पर लिखी ...
अच्छी तरह याद है मुझे ....
जब मैंने पहली बार
तुम्हारे घर की देहरी पर
कच्चे चावल से भरा कलश
दाहिने पांव से छुआ था
कितने प्यार से सहेजा था
दाना - दाना तुमने
अमानत की तरह
वो बड़ी ही नरमी से
मेरी पायल में जड़े मोतियों को
सहलाना तुम्हारा
वो तन्मयता से मेरे पांवों को
महावर से सजाना तुम्हारा
मेरे आंचल को सलीके से संवारना
हर पूजन अनुष्ठान में
मुझे सम्मान देकर
अनुगामी बनना तुम्हारा
धरती संग आसमां की तरह
तो क्यों न मैं भी
तुम्हारे कदमों को
उसी नज़र से देखूँ
जिन नजरों से देखा था
मेरे पैरों को तुमने
जब निकाले थे
मेरे पांव में चुभे कांटे ...
तुम्हारे इस प्रेम ने
ऐसी परवाज़ दी है
ऐसा लगता है मुझे
जैसे ये तुम्हारे पैर नही
एक जोड़ा पंख हैं
मेरे लिए ....
...संध्या शर्मा ...
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021
हे नूतन वर्ष ! अबकी आना तो ...
हे नूतन वर्ष !
अबकी आना तो
मास्क लगाकर
सेनिटाइज़ होकर
हाथों को सफ़ाई से धोकर
ओमीक्रॉन, कोरोना से
पूरी दूरी बनाकर
दोनों वैक्सीन के साथ
बूस्टर से भी लैस होकर आना
तुम पूरी तरह सुरक्षित हो जाना
तुम्हारा हृदय से स्वागत करेंगे
मन की बातें आँखों से करेंगे
क्योंकि अब तुम्हारे स्वागत में
सुंदर कवितायेँ नहीं बन पा रही है
शब्द गुम हो गए ख़ुशी खो गई है
जिन्हें जीना था वे बेमौत मरे हैं
जो बच गए वे भी कम नहीं मरे हैं
हे नववर्ष तुमसे इतना है कहना
इस महामारी से बचकर रहना
हमारे थोड़े से कहे को
भलीभाँति समझ लेना
कम में या ज़्यादा में
जैसे भी हो रखना
पर पिछले साल जैसे न होना .....
सोमवार, 23 अगस्त 2021
कजलियां-छोटन ने दई, बड़न ने लई, बारन के कानन में खोंस दई
कजलियां प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा पर्व है। इसका प्रचलन सदियों से चला आ रहा है। राखी पर्व के दूसरे दिन कजलियां पर्व मनाया जाता है। इसे कई स्थानों पर भुजलिया या भुजरियां नाम से भी जाना जाता है। श्रावण मास की अष्टमी और नवमीं तिथि को बांस की छोटी-छोटी टोकरियों में खेतों से लाई मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं के दाने बोए जाते हैं।
गेहूं की फसल बोने से पहले मनाए जाने वाले इस पर्व पर मिट्टी की उर्वरक शक्ति तथा बीजों की अंकुरण क्षमता परखी जाती है। अलग-अलग खेतों से लाई गई मिट्टी में घर में रखे गेहूं के बीज को बोया जाता है।
इससे जब कजलियां तैयार होती है तो किसानों की इस बात का अंदाजा लग जाता है कि खेत की मिट्टी और गेहूं का बीज कैसा है। यदि कजलिया मानक के अनरुप पाई गई तो किसान आश्वस्त हो जाते हैं कि बीज और खेत की मिट्टी गेहूं की फसल के लिए उपयुक्त है।
यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। तकरीबन एक सप्ताह में गेहूं के पौधे उग आते हैं, जिन्हें भुजरिया कहा जाता है।
श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। कजलियों (भुजरियां) के दिन महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए और गाजे-बाजे के साथ तट या सरोवरों में कजलियां विसर्जन के लिए ले जाती हैं।
तालाबों और तटों पर कजलियां खोंट ली जाती हैं और बची टोकरियों का विसर्जन कर कजलियां पर्व मनाया जाता है।
हरी-पीली व कोमल गेहूं की बालियों को आदर और सम्मान के साथ भेंट करने एवं कानों में लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
तालाबों व तटों पर कजलियां विसर्जन का मेला लगता है।
चारों ओर खरीददारी के लिए दुकानें सजती हैं।
सभी एक दूसरे की सुख - समृद्घि की कामना कर पुराने राग - बैर को भूलने का संकल्प करते हैं।
मेल मिलाप के इस पर्व पर लोग एक दूसरे को कजलियों का आदान प्रदान करते हैं। जो बराबरी के हैं, वे गले लगते हैं और जो बड़े हैं वे छोटों को आशीर्वाद देते हैं। बच्चों के कान में स्नेह और आशीष स्वरुप कजलियां खोंस दी जाती है।
कजलियों को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने मिलता है। बच्चों को कजलियां देने के बाद शगुन के रूप में बड़े उन्हें उपहार देते हैं। लोग सुख - दुख बांटने, मेल-मिलाप के लिए नाते-रिश्तेदार एक दूसरे के घर जाते हैं।
मान्यतानुसार इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय से है।
इस पर्व की प्रचलित जानकारी के अनुसार आल्हा की बहन चंदा श्रावण माह में ससुराल से मायके आई तो सारे नगरवासियों ने कजलियों से उनका स्वागत किया था। महोबा के सिंह सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान की वीरगाथाएं आज भी बुंदेलखंड में गाई जाती है।
उस समय राजकुमारी तालाब में कजली सिराने अपनी सखियों के साथ गई हुई थी। राजकुमारी को पृथ्वीराज से बचाने के लिए राज्य के वीर महोबा के वीर सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान ने वीरतापूर्ण पराक्रम दिखाया था। इन दो वीरों के साथ में चन्द्रावलि के ममेरे भाई अभई भी उरई से जा पहुंचें। कीरत सागर ताल के पास हुई लड़ाई में अभई को वीरगति प्राप्त हुई। उसमें राजा परमाल का बेटा रंजीत भी शहीद हो गया।
बाद में आल्हा-ऊदल, और राजा परमाल के पुत्र ने बड़ी वीरता से पृथ्वीराज की सेना को हराया और वहां से भागने पर मजबूर कर भगा दिया। महोबे की जीत के बाद पूरे बुन्देलखंड में कजलियां का त्योहार मनाया जाने लगा।
शनिवार, 15 मई 2021
कोरोना : आपबीती 3
दूसरे दिन आख़िर सुबह से ड्रिप लगा ही दी गई जो लगभग सात घंटे चली ! दवा , ड्रिप और ऑक्सीजन के साथ ये दोनों दिन सकुशल बीत गए और 8 मार्च की सुबह के राउंड के बाद हमें डिस्चार्ज मिल गया . शाम को चार बजे तक हम घर आ गए !
इधर घर को सेनेटाइज़ करवा लिया गया था . छोटी बहन सीमा ने सबकुछ तैयारी करके रखी थी ताकि हम नहाधोकर आराम कर सकें !
खाने पीने और सारी देखभाल का पूरा जिम्मा दोनों बहनों सरोज और सीमा ने ले लिया था, उन दोनों ने किसी भी बात की ज़रा सी भी कमी नहीं होने दी | हर बात का ध्यान रख रही थी ताकि हम जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाएँ ! उधर दीपाश्री भी ख़ूब ध्यान रख रही थी ! हमारी सुबह, दोपहर और रात की हर रीडिंग पर नज़र थी उसकी ! डॉक्टर सारडा सर भी बराबर ध्यान दे रहे थे . घर आने के बाद भी हम दोनों का शुगर लेबल बहुत बढ़ा था, उन्होने इन्सुलिन और दवा देकर सामान्य लाने के सभी प्रयत्न किये !
घर आये अभी दो दिन भी नहीं हुए थे कि अंशुल की एक आँख में दर्द और लाली आ गई ! दूसरे दिन हल्का बुख़ार भी आ गया ! 11 मार्च को उसकी रिपोर्ट भी पॉज़िटिव आ गई ! अपनी तकलीफों और दर्द से उबर भी नहीं पाए थे कि बेटे का पॉज़िटिव होना बहुत दुःखी कर गया !
अंशुल के लिए भी सारडा सर का इलाज़ शुरू हुआ ! लगभग चार या पाँच दिन बाद उन्होंने कहा 'यदि कल तक बुख़ार ठीक नहीं हुआ तो अंशुल को भी एडमिट करना होगा ' लेकिन ईश्वर की कृपा से उसके बाद उसे बुख़ार नहीं आया और सारडा सर के ईलाज़ से अंशुल घर पर रहकर ही दवाओं से स्वस्थ हो गया |
इस कोरोनाकाल में कोरोना प्रभावित होने पर भी मन में यही विश्वास था कि हमें स्वस्थ होना है और इसी विश्वास ने हमें कोरोना से जीत भी दिलाई !
कमज़ोरी बहुत थी! ऐसी कि ब्रश करने, खाना खाने तक से थकान होती थी !
लेकिन पौष्टिक प्रोटीन युक्त सादा कम तेल और मसाले का समय पर भोजन, फ़ल ( सेव, संतरे, मौसम्बी, कीवी, नारियल पानी ) आदि समय पर लिए तो कमज़ोरी भी काफी कम हो गई है ! खुश्बू भी आने लगी कुछ समय बाद .
मुनक्के को हल्का सा भूनकर उसमें सेंधा नमक डालकर चूसने से मुंह का स्वाद भी वापस आ गया है !
"हम तीनों ने आइसोलेशन का पूर्णतः पालन किया ताकि हमारे कारण किसी भी व्यक्ति में कोरोना वायरस का संक्रमण न फैले | "
कोरोना से स्वस्थ होने के पश्चात् भी ध्यान रखने योग्य कुछ ज़रूरी बातें -
पोस्ट कोविड हेतु डॉक्टर से परामर्श लें और उनकी देखरेख में इलाज़ करवायें, क्योंकि दवाओं के विपरीत प्रभाव के कारण कई परेशानियाँ हो सकती हैं !
पौष्टिक प्रोटीनयुक्त भोजन करें !
भरपूर पानी पियें।
आराम करें |
सामर्थ्य अनुसार हल्का व्यायाम करें |
मुंह की सफाई (oral hygiene) का ख़याल रखें ! दिन में कम से कम दो बार गुनगुने नमक के पानी से और एक बार बेटाडीन से गरारे करें |
दिन में दो से तीन बार भाप लें |
कुछ देर धूप में अवश्य बैठें |
कोरोना संक्रमण काल में लोग घबराहट के कारण मनोस्थिति से नियंत्रण खो रहे हैं। ऐसे समय में धैर्य के साथ महामारी का मुकाबला करना बहुत जरूरी है।
कोरोना की आधी जंग तो मन से जीती जा सकती है। डाक्टर सभी मरीजों को बेहतर उपचार देने का प्रयास करते हैं, लेकिन जो लोग मन से भय निकालकर धैर्य और सकारात्मक भाव से रहते हैं, वे कोरोना से लड़ाई में जीतकर पूरे समाज के लिए उदाहरण बनते हैं।
वायरल का सीजन है इसलिए बुखार आते ही कोरोना का भाव मन में लाना उचित नहीं। विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लें व जांच कराएं।
मन में सावधानी तो रहे लेकिन नकारात्मक भय न आने दें।
कोरोना संबंधित समाचारों को कम से कम देखें।
सोशल मीडिया पर आने वाले सभी तथ्य प्रमाणित नहीं होते। स्वविवेक से भी काम लें | मन में आने वाले विचारों की तार्किकता पर ध्यान दें|
व्यस्त दैनिक दिनचर्या रखें। टीवी पर न्यूज की जगह रियलिटी सीरियल, गेम्स देखें | मनपसंद संगीत सुनें |
जो कोरोना मरीज स्वस्थ होकर अपना दैनिक जीवनयापन कर रहे हैं, उनसे सीख लेकर स्वयं को सकारात्मक भाव में रखें।
कहानियां, कविताएं, उपन्यास आदि पढ़कर अपना ज्ञानवर्धन करें।
सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, टीकाकरण करवाकर स्वयं को सुरक्षित करें व दूसरों को इसके लिए प्रेरित करें |
शुक्रवार, 14 मई 2021
कोरोना : आपबीती 2
" उस वक़्त बेटा फीस जमा करने गया हुआ था . हमने कहा चलते हैं बाद में मिल लेंगे तो वह बोली "नहीं ! आप लोग इंतज़ार कर लीजिये और मिलकर ही चलिए " उसके इस कथन ने एक ही पल में कोरोना की भयावह हक़ीक़त सामने ला दी थी !
हम दोनों को एक ही रूम में बेड दे दिए गए .हॉस्पिटल में इलाज़ चालू हो गया . पहले दिन दो डोज़ दिए गए रेमिडेसिविर के और अगले पाँच दिन एक - एक देने थे | इसके अलावा भी सारी दवाइयाँ, सलाईन चल रही थी !
हॉस्पिटल से ही नाश्ते खाने चाय के अलावा सुबह काढ़ा और रात में हल्दी वाला दूध भी दिया जा रहा था|
दिन में तीन से चार बार भाप लेना और गार्गल करना भी जारी था |
यानी सारी पैथी को साथ लेकर चल रहे थे डॉक्टर ... लक्ष्य केवल मरीज का स्वस्थ होकर घर जाना था |
हम दोनों की हालत में बहुत अच्छा सुधार हो रहा था . 5 मार्च को डॉक्टर कह गए थे कि आज शाम के सी टी स्कैन के बाद सब सामान्य होने पर दूसरे दिन डिस्चार्ज कर दिया जायेगा !
शाम को सी टी स्कैन हुआ और 6 अप्रेल की सुबह डॉक्टर ने राउंड के समय हम दोनों को डिस्चार्ज नोट दे दिया | बहुत ख़ुशी - ख़ुशी सभी दवाईयां और ज़रूरी कागज़ात बैग में रखकर तैयार बैठे थे हम घर जाने के लिए |हमारे पास जो भी सामान था हमने वहीं छोड़ दिया था ताकि ज़रूरतमंदों के काम आ सके जिसमें स्टीम लेने और गर्म पानी करने की इलेक्ट्रिक वाली केतली आदि थे |
सारी फॉर्मेलिटी और बिलिंग की प्रक्रिया होते - होते दोपहर के लगभग चार बज चुके थे |हमारा दोपहर का भोजन भी वहीं हो गया था !
तभी अचानक मुझे बेचैनी सी महसूस हुई और हृदय गति बहुत तेज़ हो गई ! इस बैचेनी में भी दिमाग ने समय पर काम किया . मैंने तुरंत ऑक्सीमीटर में पल्स रेट देखा तो काफी बढ़ा हुआ दिखा ! शर्मा जी तुरंत डॉक्टर को बुला लाये और उसी समय मैं अपने डॉक्टर सारडा सर को फोन लगाकर बता ही रही थी कि हॉस्पिटल के डॉक्टर रुम में आ गए . उन्होंने तुरंत ई सी जी किया और कुछ दवाएं दी और मुझे आई सी यू में शिफ़्ट कर दिया !
बता दिया गया कि दो दिन मुझे आई सी यू में रहना था ! लेकिन मुझे इस बात की तसल्ली थी कि हाथ से आई वी सैट निकाल दिया गया था उसे पुनः नहीं लगाया गया था ! पूरे हाथ की नसें ड्रिप लगने से बहुत तकलीफ में थी !
लोगों की असली तकलीफें मुझे यहाँ आई सी यू में आकर देखने मिली ! जीवन में पहली बार इस जगह को देखा था ! पूरे शरीर में मशीनें, नाक में ऑक्सीजन पाईप और सिर के पास गूँजती मॉनिटर की तेज़ आवाज़ !
रात हो चली थी अगल - बगल आमने सामने हर तरफ कोरोना के मरीज़ थे ! बगल वाले का ऑक्सीजन लेबल बहुत कम था और वे ऑक्सीजन मास्क हटाकर इधर उधर कर दे रहे थे ! ड्यूटी पर उपस्थित सिस्टर उन्हें हर बार समझाती और बार - बार लगाकर दे रही थी . सारे स्टाफ और विशेषकर छोटी - छोटी उम्र की उन नर्सों का सेवाभाव मुझे हमेशा याद आता है ! हर वक़्त मुस्कुराते हुए अपने काम को सेवा के भाव और बड़ी लगन से करती, पी पी ई किट के अंदर बंद सभी एक जैसी लगती ! कितनी तकलीफ़ होती होगी इतनी गर्मी में इस पी पी ई किट को पहनकर काम करते हुए यह सोचकर मन श्रद्धा से भर जाता था उनके लिए !
रात बड़ी लम्बी हो गई थी लेटा भी नहीं जा रहा था मुझे ! ज़रा सी कोशिश भी करती तो पल्स रेट बहुत नीचे गिरने लगता था ! लग रहा था कि किसी से सारी रात बात करके इस रात को काट लूँ लेकिन बात भी नहीं की जा सकती थी ! एक बार सिस्टर से रिक्वेस्ट की कि मॉनिटर की आवाज़ कम कर दीजिये लेकिन उसने कहा ये ज़रूरी है आपके लिए !
डॉक्टर मुझे बार बार सोने के लिए कह रहे थे पर मुझे नींद कहाँ से आती ! थोड़ी - थोड़ी देर में नए मरीज़ आ रहे थे ! आख़िर में डॉक्टर ने कहा "अच्छा ठीक है आप बैठकर आँखें बंद करो और अपनी एक - एक सांस को महसूस करो " मैंने ऐसा करने की कोशिश की तो कुछ शांति हुई ! ऐसा ही करते - करते सुबह हो गई ! .... क्रमशः
गुरुवार, 13 मई 2021
कोरोना : आपबीती 1
लगभग एक साल होने को आया था कोरोना से बचते बचाते . इतने में घर के रिनोवेशन का काम भी चालू किया है, तो उसके लिए कई चीज़ों के चुनाव हेतु अनेकों बार बाज़ार जाना हो रहा था ! इसी समय कुछ लापरवाहियों का नतीज़ा था शायद शर्मा जी को बैक पेन और बोलने में हल्की खाँसी हो रही थी . डॉक्टर को तुरंत दिखाया गया दवा भी ली लेकिन न दर्द कम हुआ न खाँसी तो बेटे ने ज़िद की कि पापा का कोरोना टैस्ट करवाना ही है . जबकि वह दो तीन दिन पहले से ही करने बोल रहा था और हम लोग सोच रहे थे कि डॉक्टर को यदि ऐसा लगता तो वे बोलते !
आखिर अंशुल (क्योंकि अंशुल ड्राइव करके साथ में आ जा रहा था ) और शर्मा जी का टैस्ट हुआ और 26 फरवरी को अंशुल की rtpcr रिपोर्ट नेगेटिव और शर्मा जी की रिपोर्ट पॉज़िटिव आई ! सारे इंतेज़ाम किये गए . हम तीनों के कमरे अलग अलग कर दिए गए . फ़्लू के साथ मल्टीविटामिन और विटामिन सी के डोज़ शुरू कर दिए .
उसी दिन से मुझे भी हल्का 99.4 तक का बुख़ार आने लगा ! मुझे अस्थमा है तो पहले से ऑक्सीजन लेवल 94 -95% रहता था . 27 फरवरी को हमारा भी कोरोना टैस्ट पॉज़िटिव आ गया ! डॉक्टर ने वही दवाईयां शुरू कर दी ! ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर, ग्लूकोमीटर और ब्लड प्रेशर मापक सभी की मॉनिटरिंग चल रही थी ! लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था !
अंशुल की डॉक्टर मित्र और हमारी बेटी जैसी डॉक्टर दीपश्री बहुत चिंतित थी, पल - पल की जानकारी और हिदायतें दे रही थी !
आखिर दीपश्री ने ही हम दोनों के कोरोना से सम्बंधित कुछ ज़रूरी ब्लड टैस्ट करवाये ! टैस्ट रिपोर्ट में मेरा D Dimer सामान्य से चार गुना बढ़ा और शर्मा जी का भी सामान्य से ज्यादा आया !
इस रिपोर्ट के तुरंत बाद से दीपश्री के द्वारा बताये गए डॉक्टर मनोहर सारडा जी से फोन पर सलाह ली गई तथा हमारे नियमित फैमिली डॉक्टर जिनका इलाज़ चल रहा था उनसे भी विचार विमर्श के बाद हम दोनों को अस्पताल में भर्ती करके इलाज करने की सहमति हुई !
क्योंकि शर्मा जी डायबिटीज़ और मैं अस्थमा की मरीज हूँ !
हॉस्पिटल के नाम से मुझे बहुत डर लगता है (क्योंकि मेरी वेन्स बहुत पतली हैं और हॉस्पिटल में एडमिट होते ही सबसे पहले आई वी सैट लगाते हैं , जो मुझे बहुत दर्द देता है !)... ऊपर से कोरोना के मरीज का तो सालभर से देखते आ रहे थे! वापस आने का कोई भरोसा नहीं !
अंशुल मुझे समझा रहा था "पापा आपके लिए ही पॉज़िटिव हुए हैं , चिंता मत करना एक रूम में ही रखेंगे दोनों को "
छोटी बहन रेखा भी बोली "देख मैं तैयार हूँ न एडमिट करने को ! कुछ नहीं होगा तुम्हें ... इंजेक्शन देना पड़ेगा जो घर में नहीं दे सकते इसलिए हॉस्पिटल में रखना पड़ेगा"
उसकी और बेटे की हिम्मत ने उर्ज़ा प्रदान की ! हम दोनों के अलग अलग बैग पैक हुए और एक मार्च को शाम चार बजे एम्बुलेंस आ गई हमें लेने !
आवाज़ करती एम्बुलेंस अभी तक रास्ते पर ही देखी थी ! तब भी बहुत घबराहट होती थी उसकी आवाज़ से ! आज ख़ुद बैठे थे उसके स्ट्रेचर के बगल वाली सीट पर हम दोनों ! जगह नहीं हो रही थी तो ड्राइवर ने मुझसे कहा कि स्ट्रेचर पर बैठ जाइये पर मैं नहीं बैठी !
बीच - बीच में ऑक्सीजन के लिए भी पूछते रहे वो लोग |
लगभग आधे घंटे में हम हॉस्पिटल पहुँच गए ! अंशुल अलग से अपनी गाड़ी से आ गया था !
सारी फॉर्मेलिटी पूरी हुई और हमे एडमिट कर लिया गया ! तुरंत ही दोनो का सी टी स्कैन हुआ . शर्मा जी का स्कोर 10 और मेरा ज़ीरो था . लेकिन साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी !
एडमिट करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद नर्स हमें ऊपर रूम में ले जाने से पहले बोली "जाने से पहले आप लोग अपने बेटे से मिल लीजिये.... क्रमशः
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021
स्वागत वसंत!!
गुरुवार, 31 दिसंबर 2020
धरती की वेदना - जन्मा कोरोना
धरती माँ ने सही
असह्य वेदना
जन्मा कोरोना
कभी रफ़्तार होती थी
मायने ज़िंदगी की
थम गई दुनिया
एक ही पल में
धरा ने खोल दिया
अपने घर का झरोखा
आसमान साफ़ किया
आँगन बुहारा
कुछ परिंदे उड़ा दिए
कुछ सहेज लिये
जल पवित्र किया
नदियाँ जी उठीं
हवा शुद्ध की
अल्प साधनों में
जीना सिखा दिया
लौटा दी प्राकृतिक छटा
ताकि सांस ले सके जीवन
पनपती रहें वनस्पतियां
बचे रहें पहाड़
आओ इस नए साल में
संकल्प लें हम सब
धरती माँ की आज्ञा
सहजता से स्वीकार
उसे सहयोग करेंगे
उसके आँगन को
सदा सहेजकर रखेंगे
मानव जाति को बचाने....
नव संकल्प के साथ आंग्ल नूतन वर्ष की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें ...

