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बुधवार, 16 जुलाई 2025

एक ख़त बीते लम्हों के नाम... संध्या शर्मा

एक ख़त लिखना चाहती हूँ मैं,  

उन गुजरे पलों के नाम,  

जो छू गए थे मन को कभी

और खो गए थे वक़्त के अंधेरों में।


काग़ज़ पे उतर आएँगे,

कुछ धुंधले से चेहरे,

हँसती आँखें, अधूरे ख़्वाब

और वो बिखरी चुप्पियाँ।  


हर शब्द होगा एक दर्द,

हर पंक्ति एक सिसकी,

मगर ये ख़त पढ़ेगा कौन?  

वक़्त तो बहरा है...!


भेजूँगी नहीं इसे कहीं मैं,

रख दूँगी दिल की किसी कोठरी में,

जहाँ गूँजती रहेगी हर पंक्ति

एक अनसुनी कहानी की तरह।  

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

दर्द...!!!


भरोसे के छल में लिपटे 
जितने तीर थे
वक़्त के तरकश में
सारे के सारे
छोड़े जा चुके
वज़ूद की पीठ पर
छलनी हो चुके
तार-तार हो चुके
भोले-भाले वज़ूद को
इतनी आदत सी हो गई है
इन छली तीरों की
यदि दर्द ना मिले
तो दर्द होता है
ऐसा लगता है
जैसे ये जख्म नहीं रहे
दवा हो गए हों...

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

पराई प्यास....

अधपके बालों के बीच 
दर्द भरा निस्तेज चेहरा
निढाल, बेहाल 
जैसे गिन रहा हो अपनी ही
सांसों का आना-जाना
ज्वर की तपन से तप्त 
रग-रग में दौड़ती थकान 
दिनभर की भाग-दौड़ से 
चूर-चूर मज़बूर
व्याकुल शरीर 
कब से जुटा रहा है 
थोड़ी सी हिम्मत
उठे जाकर ला सके
एक गिलास पानी
सूखते गले को
मिले थोड़ी राहत
और निगल सके
बुखार की दवा
कांपती उंगलियाँ
लड़खड़ाते पाँव
साथ नहीं देते
उसी वक़्त अचानक
गूंजी एक रौबदार आवाज़
रामू  एक गिलास पानी ला
अगले ही पल चल पड़ी
वह चलती फिरती लाश
ओढ़कर गरीबी का कफ़न
बुझाने पराई प्यास....

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

अपना वज़ूद बताओ... संध्या शर्मा


 सीने में गर है तुम्हारे दिल
तो दर्द से तड़पकर दिखाओ 

गर तुम्हे कोई इंसा कहे तो
मन में दर्द-ए-अहसास जगाओ

किसी ठोकर से गर टूटे दिल
नगमा मोहब्बत का सुनाओ

नफ़रत-ए-खंजर लिए लोगों को
अपनी ठोकरों से धूल चटाओ 

गर अमन से बना सको तुम 
इस जहान को जन्नत बनाओ 

है दम अगर डूबने से पहले 
मझधार से कश्ती ले आओ