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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

नवा - जूना...संध्या शर्मा

अरसे से 
ठसाठस भरा
अस्त-व्यस्त था
मन का  कमरा
आज समय मिला
नए - पुराने 

विचारों- भावों
रिश्ते-नातों
यादों-अहसासों को
झाड़-पोंछ
करीने से सहेजा
कुछ टीसती यादों को
बुहार बाहर किया 
खाली पड़े फूलदान में 

महकते अहसासों को सजाया 
बहुत जगह बन गई है
नयी उलझनों-सुलझनो को
दो पल सुस्ताने के लिए...

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

अपना वज़ूद बताओ... संध्या शर्मा


 सीने में गर है तुम्हारे दिल
तो दर्द से तड़पकर दिखाओ 

गर तुम्हे कोई इंसा कहे तो
मन में दर्द-ए-अहसास जगाओ

किसी ठोकर से गर टूटे दिल
नगमा मोहब्बत का सुनाओ

नफ़रत-ए-खंजर लिए लोगों को
अपनी ठोकरों से धूल चटाओ 

गर अमन से बना सको तुम 
इस जहान को जन्नत बनाओ 

है दम अगर डूबने से पहले 
मझधार से कश्ती ले आओ