मन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

ये क्या है...? संध्या शर्मा

 ये क्या है?

ये पुलक है, ये झंकार है,

ये अधूरे बोलों का संचार है।

ये चुप्पी में सिमटा कोलाहल है,

ये मन से उठता हालाहल है।


ये क्या है?

ये प्राणों का प्रासाद है,

नभ के तारों का नीरव संवाद है।

ये अस्तित्व की साँस लेती रागिनी है,

ये क्षण भर में सदियों की यात्रा है।


ये क्या है?

ये रोम-रोम में बहती गंग है,

ये मौन के मुख से फूटा गीत अभंग है।

ये दो पल की ओस, सदियों का सागर,

ये तुम्हारे होने का अनूठा अहसास है।


ये क्या है?

ये प्रेम नहीं, प्रेम का सोत है,

ये दिया नहीं, स्वयं ज्योत है।

ये वेदना में पलता परमानंद है 

ये तुम हो... बस यही तो है।

बस चहुं ओर आनंद ही आनंद है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

मन, शहरी नही हुआ ...

...
रोटी, मन, गाँव, शहर
सब्जी तरकारी में
फूलों की क्यारी में
रोटी के स्वाद में 
पापड़ अचार में 
मेवों पकवानों में
ऊँचे मकानों में 
बूढे से बरगद में
शहरों की सरहद में 
तीज त्योहार में 
मान मनुहार में
लोक व्यवहार में 
नवीन परिधान में 
बेगानो की भीड़ में 
संकरी गलियों में 
मौन परछाइयों में 
कांक्रीट की ज़मीन में 
धुँआ-धुँआ आसमां में 
अब भी गाँव ढूँढता है 
मन, शहरी नही हुआ ....

मंगलवार, 11 मार्च 2014

स्मृतियाँ

यही है वह एकांत
वही पेड़ और शाखाएं
स्मृतियों की छायाएँ
यहीं से उगा था
चाँद प्रीत का
यहीं मिले थे पहली बार
ठीक उसी जगह जा पहुंचे
जो जगहें जानी पहचानी थी
हमारा स्वागत नहीं करतीं
फिर क्यों आ जाते हैं यहाँ
बार-बार  ………!!


शायद कोई फ़ागुनी  बयार                                          
उतार फेंके पातों के पीले पर्दे
सूनी डालों पर हरियाए
कुछ अपनापन
अलसाई दुपहरी में                   
बौरा उठे इनका भी मन                    
इन सूनी घडि़यों में
मन की बनकर धड़कन                                
देखो एक कली कुलबुलाई
सेमल के अरुण कपोलों पर
वासंती लाली छाई..........

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

तुम जो मिल गए हो... संध्या शर्मा

मेरे जीवन का 
हर रंग, हर अहसास
हर महक, हर स्वाद
सिर्फ तुमसे है
कोई वजूद नहीं मेरा
तुम्हारे बिना
मेरी आँखों में
चमकता है
तुम्हारा प्यार
महकती है
तुम्हारी खुशबू से
मन की रजनीगंधा 
रौशन है
तुम्हारी चांदनी से
मेरी हर शाम
तुम्हारा साथ
आशा की रेशमी डोर
तुम्हारा हाथ
मज़बूत विश्वास
हर आहट मुझ तक
तुमसे होकर आती है
इतना ही  जानता है
मेरा कोमल मन
तुमसे मिला अपनापन
न्योछावर है तुमपर
मेरा सर्वस्व
समर्पित है तुम्हे
सारा जीवन..... 

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

जीवन के रंग.... संध्या शर्मा

http://onesoulpurpose.files.wordpress.com/2010/01/188701335_f0282189d2_wuhse_7777.jpg

संध्या वेला 
जीवन की
हिसाब लगाया
कितना कमाया
क्या गंवाया

कमाया...?
धन, ऐश्वर्य, मान
गंवाया ...?
स्नेह - सुख,
अपनों  का साथ

आयु घटी
बढ़ा धन
अपने हुए दूर
हाथ लगे
बस चार क्षण 

दुःख मनाऊँ, अभिमान करूँ
या स्नेह दूँ, सुख दूँ उन्हें
जो कबके आगे निकल गए
मुझे अकेला छोड़ किनारे 
नफे घाटे का हिसाब जोड़ते ....

मन में आस है
दूर तलक जाने का
विश्वास है 
चार पल ही सही
जीवन है यही

कोई न हो न सही
निस्संग हूँ
नहीं हूँ एकाकी
मेरा मन
मेरा साथी...

गुरुवार, 14 जून 2012

तलाश... संध्या शर्मा



प्रश्न - उत्तर 
समस्या - समाधान
उलझन ही उलझन
अस्तित्वहीनता
डरा सहमा मन
उबरने की कोशिश
लड़खड़ाते कदम
मन कुछ कहता है
और दिमाग कुछ
भटकता है
मन
कानन - कानन ...
मीलों नंगे पाँव
कंटीली, पथरीली राह
घायल क़दम
भागता मन
थका - थका सा
तभी....
देती है
सुनाई
एक आवाज़ 
यह तो है शुरुआत
ढल जाएगी रात
कुहासा छंट जायेगा
चलते चलो 
मंजिल होगी
तुम्हारे पास 
चमक उठती हैं
मन की आँखें
झलक जाती हैं
ख़ुशी से
मन धीरे से
कुछ कहता है...

और चल पड़ता है
दुगुने उत्साह से
बिना थके / बिना रुके
लम्बी रात
सी राह पर
तलाश में
एक सुनहरी सुबह की ...

बुधवार, 9 मई 2012

शब्दाकुंरण... संध्या शर्मा

कुछ शब्द मेरे

जो होठों तक आकर

अचानक पलटे

अंतस में गहरे उतरे

एक बीज की तरह

हाड मांस की उर्वरता

रक्त का सिंचन पाकर

अंकुरित, पल्लवित होकर

धीरे-धीरे फ़ूलने भी लगे

उगी हरी-हरी डालियाँ

झूमने लगी अब


विस्तारित होने लगी

अन्तर मन तक

उन शब्दों की डालियाँ 

जिन्हें मैं बोल ना सकी

अब वे फ़लने लगे हैं…