मंगलवार, 29 जनवरी 2013

पहरा.... संध्या शर्मा

बावली है... 
आजकल उसे
चंदामामा, बिल्ली मौसी,
चिड़िया रानी, परियों के
सपने नहीं आते
उनकी जगह
सियार, भेड़िये,सांप
धुंए के उड़ते हुए
बवंडरों ने ले ली है 
बहुत कोशिश की उसने
लेकिन इन्हें बदल ना सकी 

धीरे - धीरे समझने लगी है
सोते जागते हर पल
उसके देह और मन पर 
जीवन भर.........!

अदृश्य नज़रों का पहरा है
सपनो पर भी....

28 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद सुन्दर ..रचना . सटीक उदगार . मन का डर .. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  3. बहुत सही लिखा है |सपने कहाँ कहाँ से आते हैं शायद मन के सोच पर निर्भर करता है |बढ़िया रचना है |
    आशा

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  4. सपने में भी असुरक्षा के डर का अहसास ,,, रचना पसंद आई,,,बधाई

    recent post: कैसा,यह गणतंत्र हमारा,

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  5. ये अनजाना भय...न जीने देता है,न सोने...
    बहुत गहन अभिव्यक्ति..

    सस्नेह
    अनु

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  6. असुरक्षा और डर का अहसास अब सपनों पर भी
    आ गया है... बहुत ही सहजता से भावों को प्रस्तुत किया है..
    भावपूर्ण रचना....

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  7. सच में सपने भी कहीं न कहीं हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी से प्रभावित होती है ,,,
    सुन्दर भावाभियक्ति !

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  8. पहरा ही नियति बन गयी है..

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  9. अदृश्य नज़रों का पहरा है
    सपनो पर भी....

    ....लाज़वाब अहसास और उनकी अभिव्यक्ति...शायद कोई इस नियति को बदल सके...

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  10. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (30-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  11. वाकई अदृश्य नजरों का पहरा है

    सपने के माध्यम से बहुत ही

    सुन्दर कटाक्ष .....या कहें व्यथा ...

    बधाई ...

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  12. सोते जागते हर पल
    उसके देह और मन पर
    जीवन भर.........!
    अदृश्य नज़रों का पहरा है
    सपनो पर भी....

    बहुत सुन्दर

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  13. बावली है...
    आजकल उसे
    चंदामामा, बिल्ली मौसी,
    चिड़िया रानी, परियों के
    सपने नहीं आते

    हर आँखों में यही आलम है बेगुनाह पर ही पहरा है

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  14. कैसी विडम्बना है ....कैसा संत्रास.....दिन रात उठते बैठे ...बस सिर्फ डर का वास

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  15. आदरणीया दीदी बेहद सुन्दर पंक्तियाँ शानदार प्रस्तुति हार्दिक बधाई

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  16. स्त्री के बचपना और उसके सपनों पर पहरा है... गहन अभिव्यक्ति, शुभकामनाएँ.

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  17. कितना कठोर है सच ... गहरी संवेदना लिए ...

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