सोमवार, 16 जुलाई 2012

रंगमंच... संध्या शर्मा

करती हूँ अभिनय
आती हूँ रंगमंच पर प्रतिदिन
भूमिका पूरी नहीं होती
हर बार ओढ़ती हूँ नया चरित्र
सजाती, संवारती हूँ
गढ़ती हूँ खुद को
रम जाती हूँ रज कर
कि खो जाये "मुझमे"
"मैं" कहीं....

अब तो हो गई है आदत
किरदार निभाने क़ी
हर आकार में ढल जाती हूँ

पानी सी.....
पहचान खोकर शायद
पा सकूँ खुद को
समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
सीप में मोती हर किसी को नहीं
मिलता...

26 टिप्‍पणियां:

  1. पहचान खोकर शायद
    पा सकूँ खुद को
    समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
    सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता...

    हर किरदार में ढाल जाएँ तो बात ही क्या ... बहुत सुंदर रचना

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  2. मेरे पास ,मेरे हर पल हैं
    फिर भी ,
    मैं अपने अनुपस्थित पल लिए
    बार बार जीती हूँ ...पर किस के लिए ?...अनु

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  3. और सीप की खोज चलती रहती है अनवरत...ताउम्र...
    बहुत सुन्दर संध्या जी.

    सस्नेह
    अनु

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  4. पहचान खोकर शायद
    पा सकूँ खुद को
    समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
    सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता.
    बहुत गहरे विचार
    बेहतरीन रचना..
    :-)

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  5. आप बने वो मोती सीप की
    यही शुभकामना है !!
    सुंदर अभिव्यक्ति ....

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  6. समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
    सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता...

    निःशब्द करती लाइन प्रणाम

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  7. पहचान खोकर शायद
    पा सकूँ खुद को
    समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
    सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता.

    बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ ।

    शुभकामनाये संध्या जी।

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  8. पहचान खोकर शायद
    पा सकूँ खुद को

    बेहतरीन भाव ......!

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  9. करती हूँ अभिनय
    आती हूँ रंगमंच पर प्रतिदिन
    भूमिका पूरी नहीं होती
    हर बार ओढ़ती हूँ नया चरित्र
    सजाती, संवारती हूँ
    अत्यंत सूक्षम चिंतन और चित्रण किया है आपने . बहुत बहुत शुभकामनायें ....!

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  10. समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
    सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता...

    बेहतरीन।


    सादर

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  11. सीप में मोती किसी को नहीं मिलता, यह मनुष्य की ट्रैजिक नियति है इसे आपने सुंदर शब्दों में ढाला है। संध्या मेरी बड़ी बहन हैं वो लिखती नहीं है लेकिन जब भी भांजे के स्कूल में कविता पाठ होता है मुझे लिखने कहती है कल मैंने बापू पर एक कविता लिखी। जब भी आपका ब्लाग देखता हूँ मुझे बहन के साथ बिताए हुए बचपन के क्षण याद आ जाते हैं।

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  12. अब तो हो गई है आदत
    किरदार निभाने क़ी
    हर आकार में ढल जाती हूँ
    पानी सी..... बेजोड़

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  13. वाह... वाह..... बहुत ही सुन्दर.....बहुत ही शानदार.....हैट्स ऑफ इसके लिए ।

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  14. सीप में मिली मोती सी रचना...सुन्दर..

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  15. समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
    सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता...आपने सही कहा

    भावमय बेहतरीन प्रस्तुति,,,,,सुंदर रचना,,,,,

    RECENT POST ...: आई देश में आंधियाँ....

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  16. khoobsoorat....detached rah kar kartvy bhi achche se poora hota hai aur takleef bhi kam hoti hai .

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  17. सही कहा सब को सब कुछ नही मिलता....बहुत सुन्दर..

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  18. संसार एक रंगमंच है। ईश्वर जिसे जो किरदार सौंपा है उसे वह निभाना है। फ़िर पात्र को एक मुखौटा उतार कर दुसरा पहन लेना है, अन्य किरदार निभाने के लिए। यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है और चल भी रहा है। इस बीच अगर अभीष्ट की प्राप्ति हो जाए तो वह ईश्वरीय कृपा ही है। सुंदर सारगर्भित रचना के लिए आभार, हरेली अमावस की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई

    शSSSSSSSSSS
    कोई है

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  19. समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
    सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता...

    ....बहुत खूब! लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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  20. सच कहा आपने
    आती हूँ रंगमंच पर प्रतिदिन
    भूमिका पूरी नहीं होती
    हर बार ओढ़ती हूँ नया चरित्र
    सजाती, संवारती हूँ
    बेहद खूबसूरत , आभार .
    सादर
    आपका सवाई
    ऐसे नबंरो पर कॉल ना करे. पढ़ें और शेयर

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