सोमवार, 9 जुलाई 2012

अंजुरी में धरती ... संध्या शर्मा

मान गए बादल रूठे  
बरसे तो जमकर बरसे 
धरती रही
फिर भी प्यासी
व्याकुल हो उठा मन
देखकर व्यर्थ जाता
जीवन जल
ऐसा लगता है
वर्षा का सारा जल
भर लूँ अंजुरी में 
ताकि....!
ना बह सके
ना बिखरे
ना व्यर्थ हो
एक भी बूँद
हर एक बूँद
धरती में समाये
लहराए इठलाये
नदी बन जाये
सजाये प्रकृति का स्वरुप 
निखरे उसका रंग - रूप 
खिले कोपल तरुवर पर
गूंजे कोयल का स्वर
पवन स्पर्श से
जैसे बिखरे गुलाल 
सुन्दर फूलों से
शोभित हो हर डाल
फैली हो हरियाली चहुँ ओर
नाच उठे धरती का मनमोर...!

31 टिप्‍पणियां:

  1. "Varsha Jal Sanchay" ka ek Accha Sandesh Deti Hui Yah Kavita Sunder Lagi.

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. बहुत सुन्दर संध्या जी...
    प्यारी धरती को समर्पित प्यारी सी रचना....
    सस्नेह
    अनु

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  4. अंजुरी में धरती नेह की बूंदे ...
    अनुपम भाव संयोजन ...

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  5. फैली हो हरियाली चहुँ ओर
    नाच उठे धरती का मनमोर...!

    लाजबाब भाव,,सुंदर रचना,,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

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  6. अंजुरी भर भर जल भरू ..कोई प्यासा न रहपाय..बहुत सुन्दर रचना..लाजवाब भाव..संध्या जी..

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  7. ठंढी ठंढी पावन का झकोरा ...... मोरा जिया धक् धक् रे चमके बिजुरिया

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  8. वर्षा जल संचयन का सार्थक संदेश।
    काश आपकी कविता के मर्म को सभी समझें।


    सादर

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  9. बहुत - बहुत सुन्दर ,
    जल संचयन का सन्देश देती
    प्यारी , मनभावन रचना...
    :-)

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  10. धरती को समर्पित प्यारी सी
    बहुत अच्छी रचना..बधाई

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  11. सुंदर संदेश देती सार्थक रचना !!

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  12. उत्‍कृष्‍ट भाव..अति सुन्दर शब्द प्रवाह..

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  13. बहित हू भावपूर्ण रचना। मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  14. वर्षा ऋतू की छटा चहु ओर है ..
    kalamdaan.blogspot.in

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  15. अच्छा प्रयास है जल का संग्रह करने का .....!

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  16. धारा के बारे में बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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  17. वर्षा का सारा जल
    भर लूँ अंजुरी में
    ताकि....!
    ना बह सके
    ना बिखरे
    ना व्यर्थ हो
    एक भी बूँद
    हर एक बूँद
    धरती में समाये

    वाह ! बहुत सुंदर.....

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  18. कल 11/07/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    '' अहा ! क्‍या तो बारिश है !! ''

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  19. बारिश सभी को सराबोर कर देती है...

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  20. बरखा रानी के साथ मयूर नाच उठते हैं ... सभी खिल उठते हैं ... धरती की प्यास बुझती है .. मनमोहक लाजवाब रचना ...

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  21. bahut sunder abhivyakti.

    apke dard ke sath ek mera dard bhi yaad aa gaya. ham sab barish k liye taraste rahte hain..aur jb barish aati hai to sarkar k nikammepan k karan jo sadke ghaddo se saji hain vo aur saj jati hain...gutter bhar jate hain, siver line over ho jati hain tab jo aam aadmi barsat ki intjar karta hai vo sarkar ki laaparwahi k karan barsat se jaldi hi uff bhi karta hai.

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  22. फैली हो हरियाली चहुँ ओर
    नाच उठे धरती का मनमोर...!
    बहुत सुंदर भाव ...कोमल से ...!!
    शुभकामनायें..

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  23. यहां दायरे में बांधने को उत्सुक मन
    वहाँ दायरे से उन्मुक्त होने को मन

    दो अलहदा भाव है, जिन्हे एक कविमन ही जी सकता है। बेहतरीन अभिव्यक्ति

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